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Samveda Mantra 1345

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
य꣢꣫त्सानोः꣣ सा꣡न्वारु꣢꣯हो꣣ भू꣡र्यस्प꣢꣯ष्ट꣣ क꣡र्त्व꣢म् । त꣢꣫दिन्द्रो꣣ अ꣡र्थं꣢ चेतति यू꣣थे꣡न꣢ वृ꣣ष्णि꣡रे꣢जति ॥१३४५॥

य꣢त् । सा꣡नोः꣢꣯ । सा꣡नु꣢꣯ । आ꣡रु꣢꣯हः । आ꣣ । अ꣡रुहः꣢꣯ । भू꣡रि꣢꣯ । अ꣡स्प꣢꣯ष्ट । क꣡र्त्व꣢꣯म् । तत् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । अ꣡र्थ꣢꣯म् । चे꣣तति । यूथे꣡न꣢ । वृ꣣ष्णिः꣢ । ए꣣जति ॥१३४५॥

Mantra without Swara
यत्सानोः सान्वारुहो भूर्यस्पष्ट कर्त्वम् । तदिन्द्रो अर्थं चेतति यूथेन वृष्णिरेजति ॥

यत् । सानोः । सानु । आरुहः । आ । अरुहः । भूरि । अस्पष्ट । कर्त्वम् । तत् । इन्द्रः । अर्थम् । चेतति । यूथेन । वृष्णिः । एजति ॥१३४५॥

Samveda - Mantra Number : 1345
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 12;

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Meaning
मनुष्य (यत्) जब (सानोः सानु) एक शिखर से दूसरे उच्चतर शिखर पर, अर्थात् एक लक्ष्य को पार करके उससे ऊँचे दूसरे लक्ष्य पर (आरुहः) चढ़कर पहुँच जाता हैऔर (भूरि) बहुत से (कर्त्वम्) करने योग्य कार्य को (अस्पष्ट) करता है, (तत्) तब (इन्द्रः) विघ्नविनाशक परमेश्वर, उसके (अर्थम्) उदेश्य को (चेतति) जान लेता है और (वृष्णिः) बल, सुख, आदि को बरसानेवाला होता हुआ (यूथेन) गुणसमूह के साथ (एजति) उसे प्राप्त होता है ॥२॥
Essence
प्रगति के पथ पर जाते हुए मनुष्य का जगदीश्वर परम सहायक हो जाता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर के सहायक होने का वर्णन है।