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Samveda Mantra 1344

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
गा꣡य꣢न्ति त्वा गाय꣣त्रि꣡णोऽर्च꣢꣯न्त्य꣣र्क꣢म꣣र्कि꣡णः꣢ । ब्र꣣ह्मा꣡ण꣢स्त्वा शतक्रत꣣ उ꣢द्व꣣ꣳश꣡मि꣢व येमिरे ॥१३४४॥

गा꣡य꣢꣯न्ति । त्वा꣣ । गायत्रि꣡णः꣢ । अ꣡र्च꣢꣯न्ति । अ꣣र्क꣢म् । अ꣣र्कि꣡णः꣢ । ब्र꣣ह्मा꣡णः꣢ । त्वा꣣ । शतक्रतो । शत । क्रतो । उ꣢त् । व꣣ꣳश꣢म् । इ꣣व । येमिरे ॥१३४४॥

Mantra without Swara
गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः । ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वꣳशमिव येमिरे ॥

गायन्ति । त्वा । गायत्रिणः । अर्चन्ति । अर्कम् । अर्किणः । ब्रह्माणः । त्वा । शतक्रतो । शत । क्रतो । उत् । वꣳशम् । इव । येमिरे ॥१३४४॥

Samveda - Mantra Number : 1344
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 12;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शतक्रतो) असंख्यात कर्मों वा प्रज्ञाओंवाले जगदीश्वर ! (त्वा) गाये जाने योग्य आपकी (गायत्रिणः) जिन्होंने वेदों के गायत्री आदि प्रशस्त छन्दों का अध्ययन किया हुआ है, ऐसे धार्मिक ईश्वरोपासक लोग (गायन्ति) सामवेद आदि के गान द्वारा प्रशंसा करते हैं। (अर्किणः) वेदमन्त्र जिनके ज्ञान के साधन हैं, ऐसे लोग (अर्कम्) सब जनों के पूजनीय आपकी (अर्चन्ति) नित्य पूजा करते हैं। (ब्रह्माणः) वेदार्थों को जानकर तदनुसार कर्म करनेवाले विद्वान् लोग (त्वा) जगत् के रचयिता आपको (उद्येमिरे) अपने प्रति उद्यमवान् करते हैं, (वंशम् इव) जैसे उत्कृष्ट गुणों और शिक्षाओं से लोग अपने कुल को (उद् येमिरे) उद्यमी बनाते हैं ॥१॥३ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
सब मनुष्यों को चाहिए कि वे परमेश्वर का ही गान और पूजन करें, क्योंकि उसके तुल्य या उससे अधिक अन्य कोई नहीं हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ३४२ क्रमाङ्क पर परमेश्वर की अर्चना के विषय में हो चुकी है। यहाँ भी उसी विषय का वर्णन करते हैं।