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Samveda Mantra 1338

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣢ घा꣣ ये꣢ अ꣣ग्नि꣢मि꣣न्ध꣡ते꣢ स्तृ꣣ण꣡न्ति꣢ ब꣣र्हि꣡रा꣢नु꣣ष꣢क् । ये꣢षा꣣मि꣢न्द्रो꣣ यु꣢वा꣣ स꣡खा꣢ ॥१३३८॥

आ꣢ । घ꣣ । ये꣢ । अ꣣ग्नि꣢म् । इ꣣न्ध꣡ते꣢ । स्तृ꣣ण꣡न्ति꣢ । ब꣣र्हिः꣢ । अ꣣नुष꣢क् । अ꣣नु । स꣢क् । ये꣡षा꣢꣯म् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । यु꣡वा꣢꣯ । स꣡खा꣢꣯ ॥१३३८॥

Mantra without Swara
आ घा ये अग्निमिन्धते स्तृणन्ति बर्हिरानुषक् । येषामिन्द्रो युवा सखा ॥

आ । घ । ये । अग्निम् । इन्धते । स्तृणन्ति । बर्हिः । अनुषक् । अनु । सक् । येषाम् । इन्द्रः । युवा । सखा ॥१३३८॥

Samveda - Mantra Number : 1338
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 12;

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Meaning
(येषाम्) जिन उपासकों का वा प्रजाजनों का (युवा) युवक (इन्द्रः) वीर परमेश्वर वा वीर राजा (सखा) सहायक हो जाता है और (ये घ) जो (अग्निम्) ईश्वर-भक्ति वा राष्ट्र-भक्ति की अग्नि को (आ इन्धते) अपने अन्तःकरण में प्रदीप्त कर लेते हैं, वे (आनुषक्) निरन्तर (बर्हिः) ब्रह्मयज्ञ वा राष्ट्रयज्ञ को (स्तृणन्ति) फैलाते हैं ॥१॥
Essence
मनुष्यों को चाहिए कि परमेश्वर को ही उपास्यरूप में वरण करें। प्रजाजनों को चाहिए कि युवा तथा राष्ट्र की रक्षा में समर्थ मनुष्य को ही राजा रूप में स्वीकार करें और स्वयं राष्ट्रभक्त हों ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में १३३ क्रमाङ्क पर अध्यात्म पक्ष में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ अध्यात्म विषय और राष्ट्र का विषय वर्णित करते हैं।