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Samveda Mantra 1327

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मनुराप्सवः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त꣡व꣢ द्र꣣प्सा꣡ उ꣢द꣣प्रु꣢त꣣ इ꣢न्द्रं꣣ म꣡दा꣢य वावृधुः । त्वां꣢ दे꣣वा꣡सो꣢ अ꣣मृ꣡ता꣢य꣣ कं꣡ प꣢पुः ॥१३२७॥

त꣡व꣢꣯ । द्र꣣प्साः꣢ । उ꣣दप्रु꣡तः꣢ । उ꣣द । प्रु꣡तः꣢꣯ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । म꣡दा꣢꣯य । वा꣣वृधुः । त्वा꣢म् । दे꣣वा꣡सः꣢ । अ꣣मृ꣡ता꣢य । अ꣣ । मृ꣡ता꣢꣯य । कम् । प꣣पुः ॥१३२७॥

Mantra without Swara
तव द्रप्सा उदप्रुत इन्द्रं मदाय वावृधुः । त्वां देवासो अमृताय कं पपुः ॥

तव । द्रप्साः । उदप्रुतः । उद । प्रुतः । इन्द्रम् । मदाय । वावृधुः । त्वाम् । देवासः । अमृताय । अ । मृताय । कम् । पपुः ॥१३२७॥

Samveda - Mantra Number : 1327
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 11;

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1 Bhashyas
Meaning
हे सोम ! हे रसागार परमेश्वर ! (तव) आपके (द्रप्साः) वेग से बहनेवाले आनन्द-रस (उदप्रुतः) अन्तःकरण में तरङ्गें उठानेवाले होते हैं। वे (इन्द्रम्) जीवात्मा को (मदाय) तृप्तिलाभ के लिए (वावृधुः) बढ़ाते हैं। (देवासः) विद्वान् लोग (कम्) सुन्दर, सर्वोपरि विराजमान, सुखस्वरूप (त्वाम्) आपको (अमृताय) अमर पद की प्राप्ति के लिए (पपुः) पान करते हैं ॥२॥
Essence
परमेश्वररूप हिमालय से निकली हुई आनन्द-रस की नदी में ही स्नान करके योगी लोग मोक्ष-पद के अधिकारी होते हैं, भौतिक गङ्गा, यमुना, सरस्वती आदि नदियों में स्नान करके नहीं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा के आनन्दरसों का वर्णन है।