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Samveda Mantra 1325

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्व꣡ꣳ सु꣢ष्वा꣣णो꣡ अद्रि꣢꣯भिर꣣꣬भ्य꣢꣯र्ष꣣ क꣡नि꣢क्रदत् । द्यु꣣म꣢न्त꣣ꣳ शु꣢ष्म꣣मा꣡ भ꣢र ॥१३२५॥

त्व꣢म् । सु꣣ष्वाणः꣢ । अ꣡द्रि꣢꣯भिः । अ । द्रि꣣भिः । अभि꣢ । अ꣣र्ष । क꣡नि꣢꣯क्रदत् । द्यु꣣म꣡न्त꣢म् । शु꣡ष्म꣢꣯म् । आ । भ꣣र ॥१३२५॥

Mantra without Swara
त्वꣳ सुष्वाणो अद्रिभिरभ्यर्ष कनिक्रदत् । द्युमन्तꣳ शुष्ममा भर ॥

त्वम् । सुष्वाणः । अद्रिभिः । अ । द्रिभिः । अभि । अर्ष । कनिक्रदत् । द्युमन्तम् । शुष्मम् । आ । भर ॥१३२५॥

Samveda - Mantra Number : 1325
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 11;

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1 Bhashyas
Meaning
हे पवित्र करनेवाले, रस के भण्डार परमेश्वर ! (अद्रिभिः) प्रणव-जप रूप सिलबट्टों से (सुष्वाणः) अभिषुत किये जाते हुए (त्वम्) आप (कनिक्रदत्) पुनः-पुनः उपदेश करते हुए (अभ्यर्ष) हमें प्राप्त होवो और (द्युमन्तम्) तेज से युक्त (शुष्मम्) आत्म-बल (आ भर) प्रदान करो ॥३॥
Essence
उपासक यदि परमात्मा के पास से कर्तव्य-अकर्तव्य का उपदेश, तेजस्विता और आत्मबल नहीं प्राप्त कर पाता तो उसकी उपासना में कोई त्रुटि है, ऐसा समझना चाहिए ॥३॥
Subject
अब परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं।