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Samveda Mantra 1322

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भर्गः प्रागाथः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्व꣡ꣳ हि रा꣢꣯धसस्पते꣣ रा꣡ध꣢सो म꣣हः꣢꣫ क्षय꣣स्या꣡सि꣢ विध꣣र्त्ता꣢ । तं꣡ त्वा꣢ व꣣यं꣡ म꣢घवन्निन्द्र गिर्वणः सु꣣ता꣡व꣢न्तो हवामहे ॥१३२२॥

त्व꣢म् । हि । रा꣣धसः । पते । रा꣡ध꣢꣯सः । म꣣हः꣢ । क्ष꣡य꣢꣯स्य । अ꣡सि꣢꣯ । वि꣣धर्त्ता꣢ । वि꣣ । धर्त्ता꣢ । तम् । त्वा꣣ । वय꣢म् । म꣣घवन् । इन्द्र । गिर्वणः । गिः । वनः । सुता꣡व꣢न्तः । ह꣣वामहे ॥१३२२॥

Mantra without Swara
त्वꣳ हि राधसस्पते राधसो महः क्षयस्यासि विधर्त्ता । तं त्वा वयं मघवन्निन्द्र गिर्वणः सुतावन्तो हवामहे ॥

त्वम् । हि । राधसः । पते । राधसः । महः । क्षयस्य । असि । विधर्त्ता । वि । धर्त्ता । तम् । त्वा । वयम् । मघवन् । इन्द्र । गिर्वणः । गिः । वनः । सुतावन्तः । हवामहे ॥१३२२॥

Samveda - Mantra Number : 1322
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 10;

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Meaning
हे (राधसः पते) सकल ऋद्धि-सिद्धियों के अधीश्वर जगदीश वा आचार्यवर ! (त्वं हि) आप (महतः) महान् (क्षयस्य) निवासक, (राधसः) विद्या, तप, तेजस्विता आदि रूप धन के (विधर्ता) विशेष रूप से धारण करनेवाले (असि) हो। हे (मघवन्) विद्या आदि के दानी, (गिर्वणः) वाचस्पति (इन्द्र) अविद्या आदि के विदारक जगदीश्वर वा आचार्य ! (सुतावन्तः) श्रद्धारस का उपहार लिये हुए (वयम्) हम उपासक वा विद्यार्थी (त्वा) आपको (हवामहे) पुकार रहे हैं ॥२॥
Essence
जैसे जगदीश्वर सब गुणों का अधिपति है, वैसे ही आचार्य वही हो सकता है जो विद्वान्, वाणी पर अधिकार रखनेवाला, तपस्वी, जितेन्द्रिय और शिक्षणकला में कुशल हो ॥२॥ इस खण्ड में जगदीश्वर और आचार्य के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ दशम अध्याय में दशम खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर जगदीश्वर और आचार्य को सम्बोधन है।

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