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Samveda Mantra 1321

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भर्गः प्रागाथः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
य꣡त꣢ इन्द्र꣣ भ꣡या꣢महे꣣ त꣡तो꣢ नो꣣ अ꣡भ꣢यं कृधि । म꣡घ꣢वञ्छ꣣ग्धि꣢꣫ तव꣣ त꣡न्न꣢ ऊ꣣त꣢ये꣣ वि꣢꣫ द्विषो꣣ वि꣡ मृधो꣢꣯ जहि ॥१३२१॥

य꣡तः꣢꣯ । इ꣣न्द्र । भ꣡या꣢꣯महे । त꣡तः꣢꣯ । नः꣣ । अ꣡भ꣢꣯यम् । अ । भ꣣यम् । कृ꣡धि । मघ꣢꣯वन् । श꣣ग्धि꣢ । त꣡व꣢꣯ । तत् । नः꣣ । ऊत꣡ये꣢ । वि । द्वि꣡षः꣢꣯ । वि । मृ꣡धः꣢꣯ । ज꣣हि ॥१३२१॥

Mantra without Swara
यत इन्द्र भयामहे ततो नो अभयं कृधि । मघवञ्छग्धि तव तन्न ऊतये वि द्विषो वि मृधो जहि ॥

यतः । इन्द्र । भयामहे । ततः । नः । अभयम् । अ । भयम् । कृधि । मघवन् । शग्धि । तव । तत् । नः । ऊतये । वि । द्विषः । वि । मृधः । जहि ॥१३२१॥

Samveda - Mantra Number : 1321
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 10;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) परमैश्वर्यवान् जगदीश्वर वा विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्यवर ! हम (यतः) जिस अज्ञान, पाप, दुर्व्यसन, चोर, बाघ आदि से (भयामहे) डरते हैं, (ततः) उससे (नः) हमें (अभयम्) निर्भयता (कृधि) प्रदान करो। हे (मघवन्) निर्भयतारूप धन के धनी ! (शग्धि) हमें शक्ति दो। (तव) आपका (तत्) वह अभयदान (नः) हमारी (ऊतये) रक्षा के लिए होवे। आप (द्विषः) द्वेषवृत्तियों को (वि) विनष्ट कर दो, (मृधः) हिंसावृत्तियों को वा काम, क्रोध आदियों को (वि जहि) विनष्ट कर दो ॥१॥
Essence
जैसे जगदीश्वर अपने उपासकों को निर्भय करता है, वैसे ही आचार्य को भी चाहिए कि वह विद्या पढ़ाने के साथ-साथ निर्भयता आदि गुण भी विद्यार्थियों के अन्दर उत्पन्न करे ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक २७४ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ जगदीश्वर और आचार्य से प्रार्थना है।