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Samveda Mantra 131

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡पि꣢बत्क꣣द्रु꣡वः꣢ सु꣣त꣡मिन्द्रः꣢꣯ स꣣ह꣡स्र꣢बाह्वे । त꣡त्रा꣢ददिष्ट꣣ पौ꣡ꣳस्य꣢म् ॥१३१॥

अ꣡पि꣢꣯बत् । क꣣द्रु꣡वः꣢ । क꣣त् । द्रु꣡वः꣢꣯ । सु꣣त꣢म् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । स꣣ह꣡स्र꣢बाह्वे । स꣣ह꣡स्र꣢ । बा꣣ह्वे । त꣡त्र꣢꣯ । अ꣣ददिष्ट । पौँ꣡स्य꣢꣯म् । ॥१३१॥

Mantra without Swara
अपिबत्कद्रुवः सुतमिन्द्रः सहस्रबाह्वे । तत्राददिष्ट पौꣳस्यम् ॥

अपिबत् । कद्रुवः । कत् । द्रुवः । सुतम् । इन्द्रः । सहस्रबाह्वे । सहस्र । बाह्वे । तत्र । अददिष्ट । पौँस्यम् । ॥१३१॥

Samveda - Mantra Number : 131
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

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Meaning
(इन्द्रः) विघ्नविदारक, बलदायक परमेश्वर (सहस्रबाह्वे) काम, कोध्र आदि हजार भुजाओंवाले पापरूप दैत्य को मारने के लिए (कद्रुवः) क्रियाशील अथवा स्तुतिशील मनुष्य के (सुतम्) भक्तिरूप सोमरस को (अपिबत्) पीता है, और (तत्र) उस मनुष्य को (पौंस्यम्) बल, पौरुष (अददिष्ट) प्रदान करता है ॥७॥
Essence
मनुष्य बड़ा ही निर्बल है, काम-कोध्र आदि सहस्र बाहुओंवाला पापरूप दैत्य उसे अपने वश में करना चाहता है। मनुष्य क्रियाशील और पुरुषार्थी होकर भक्तवत्सल, विपत्तिभञ्जक, शक्तिदायक परमात्मा की उपासना करके उससे बल का सञ्चय कर उस सहस्रबाहु शत्रु को प्रताडित करे ॥७॥ यहाँ अपनी कल्पना से ही किसी ने कद्रु नाम की भार्या, किसी ने कद्रु नामक यजमान, किसी ने कद्रु नाम का ऋषि और किसी ने कद्रु नाम का राजा मान लिया है। परस्पर विरुद्ध उनके वचन ही एक-दूसरे की बात को काट देते हैं। असल में तो वेद में लौकिक इतिहास को खोजना खरगोश के सींग लगाने के प्रयत्न के समान निरर्थक ही है, अतः नैरुक्त पद्धति ही श्रेयस्कर है ॥७॥
Subject
स्तोता को परमेश्वर की भक्ति से क्या प्राप्त होता है, यह कहते हैं।

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