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Samveda Mantra 1307

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
म꣣हा꣢꣫ꣳ इन्द्रो꣣ य꣡ ओज꣢꣯सा प꣣र्ज꣡न्यो꣢ वृष्टि꣣मा꣡ꣳ इ꣢व । स्तो꣡मै꣢र्व꣣त्स꣡स्य꣢ वावृधे ॥१३०७॥

म꣣हा꣢न् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । यः । ओ꣡ज꣢꣯सा । प꣣र्ज꣡न्यः꣢ । वृ꣣ष्टिमा꣢न् । इ꣣व । स्तो꣡मैः꣢꣯ । व꣣त्स꣡स्य꣢ । वा꣣वृधे ॥१३०७॥

Mantra without Swara
महाꣳ इन्द्रो य ओजसा पर्जन्यो वृष्टिमाꣳ इव । स्तोमैर्वत्सस्य वावृधे ॥

महान् । इन्द्रः । यः । ओजसा । पर्जन्यः । वृष्टिमान् । इव । स्तोमैः । वत्सस्य । वावृधे ॥१३०७॥

Samveda - Mantra Number : 1307
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 8;

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Meaning
(यः इन्द्रः) जो परमैश्वर्यशाली जगदीश्वर (वृष्टिमान् पर्यन्यः इव) वृष्टिजल से परिपूर्ण मेघ के समान (ओजसा) बल से (महान्) महान् है, वह (वत्सस्य) अपने पुत्र मानव की (स्तोमैः) प्रशस्तियों से (वावृधे) बढ़ता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
जैसे पुत्र की प्रशस्तियों से पिता प्रशस्त होता है, वैसे ही पहले से ही बादल के समान महान् परमेश्वर भी मानव की प्रशस्तियों से और अधिक महान् हो जाता है ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में परमात्मा का विषय वर्णित है।

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