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Samveda Mantra 1299

1875 Mantra
Devata- पवमानाध्येता Rishi- पवित्र आङ्गिरसो वा वसिष्ठो वा उभौ वा Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
पा꣣वमानी꣢꣫र्यो अ꣣ध्ये꣡त्यृषि꣢꣯भिः꣣ स꣡म्भृ꣢त꣣ꣳ र꣡स꣢म् । त꣢स्मै꣣ स꣡र꣢स्वती दुहे क्षी꣣र꣢ꣳ स꣣र्पि꣡र्म꣢꣯धूद꣣क꣢म् ॥१२९९॥

पा꣣वमानीः꣢ । यः । अ꣣ध्ये꣡ति꣢ । अ꣣धि । ए꣡ति꣢꣯ । ऋ꣡षि꣢꣯भिः । स꣡म्भृ꣢꣯तम् । सम् । भृ꣣तम् । र꣡स꣢꣯म् । त꣡स्मै꣢꣯ । स꣡र꣢꣯स्वती । दुहे । क्षीर꣢म् । स꣣र्पिः꣢ । म꣡धु꣢꣯ । उद꣣क꣢म् ॥१२९९॥

Mantra without Swara
पावमानीर्यो अध्येत्यृषिभिः सम्भृतꣳ रसम् । तस्मै सरस्वती दुहे क्षीरꣳ सर्पिर्मधूदकम् ॥

पावमानीः । यः । अध्येति । अधि । एति । ऋषिभिः । सम्भृतम् । सम् । भृतम् । रसम् । तस्मै । सरस्वती । दुहे । क्षीरम् । सर्पिः । मधु । उदकम् ॥१२९९॥

Samveda - Mantra Number : 1299
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 7;

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो मनुष्य (ऋषिभिः संभृतं रसम्) वेद के रहस्य जाननेवाले ऋषियों ने जिनके रस का आस्वादन किया है, ऐसी (पावमानीः) पवमान देवतावाली ऋचाओं का (अध्येति) अर्थज्ञानपूर्वक अध्ययन करता है, (तस्मै) उस मनुष्य के लिए (सरस्वती) वेदमाता (क्षीरम्) दूध, (सर्पिः) घी, (मधु) शहद और (उदकम्) स्वच्छ जल (दुहे) स्वयं दुह देती है ॥ वेद में अन्यत्र भी कहा गया है—मैंने वरदात्री वेदमाता की स्तुति की है, आप लोग भी उसका अध्ययन-स्तवन करो, क्योंकि वह द्विजों को पवित्र करनेवाली है। वह मुझ वेदाध्येता को आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन, ब्रह्मवचर्स् देकर मेरे आत्मलोक ब्रह्मलोक में निवास करने लगी है। (अथ० १९।७१।१) ॥२॥
Essence
वेद का अध्ययन करके और उसके अनुकूल आचरण करके जो पुरुषार्थी होता है, वह सब सम्पदाओं को प्राप्त कर सकता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर वेदाध्ययन का फल कहा गया है।