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Samveda Mantra 1298

1875 Mantra
Devata- पवमानाध्येता Rishi- पवित्र आङ्गिरसो वा वसिष्ठो वा उभौ वा Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यः꣡ पा꣢वमा꣣नी꣢र꣣ध्ये꣡त्यृषि꣢꣯भिः꣣ स꣡म्भृ꣢त꣣ꣳ र꣡स꣢म् । स꣢र्व꣣ꣳ स꣢ पू꣣त꣡म꣢श्नाति स्वदि꣣तं꣡ मा꣢त꣣रि꣡श्व꣢ना ॥१२९८॥

यः꣢ । पा꣣वमानीः꣢ । अ꣣ध्ये꣡ति꣢ । अ꣣धि । ए꣡ति꣢꣯ । ऋ꣡षि꣢꣯भिः । सं꣡भृ꣢꣯तम् । सम् । भृ꣣तम् । र꣡स꣢꣯म् । स꣡र्व꣢꣯म् । सः । पू꣣त꣢म् । अ꣣श्नाति । स्वदित꣢म् । मा꣣तरि꣡श्व꣢ना ॥१२९८॥

Mantra without Swara
यः पावमानीरध्येत्यृषिभिः सम्भृतꣳ रसम् । सर्वꣳ स पूतमश्नाति स्वदितं मातरिश्वना ॥

यः । पावमानीः । अध्येति । अधि । एति । ऋषिभिः । संभृतम् । सम् । भृतम् । रसम् । सर्वम् । सः । पूतम् । अश्नाति । स्वदितम् । मातरिश्वना ॥१२९८॥

Samveda - Mantra Number : 1298
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 7;

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो मनुष्य (ऋषिभिः संभृतं रसम्) वेद के रहस्य को जाननेवाले ऋषियों ने जिनके रस का आस्वादन किया है, ऐसी (पावमानीः) पवमान देवतावाली ऋचाओं का (अध्येति) अर्थज्ञानपूर्वक अध्ययन करता है, (सः) वह (मातरिश्वना) वायु से (स्वदितम्) स्वादु बनाये गये (सर्वम्) सब (पूतम्) पवित्र भोज्य पदार्थ को (अश्नाति) खाता है ॥१॥ यहाँ पावमानी ऋचाओं का अध्ययन सब पवित्र भोज्य पदार्थों के आस्वादन के समान तृप्तिकारी होता है, इस प्रकार उपमा में पर्यवसान होने के कारण निदर्शना अलङ्कार है ॥१॥
Essence
वैदिक ऋचाओं के अर्थज्ञानपूर्वक अध्ययन से और उसके अनुकूल आचरण से अध्ययन करनेवालों का महान् कल्याण होता है ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में वेद के अध्ययन का फल वर्णित है।