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Samveda Mantra 128

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
मा꣡ न꣢ इन्द्रा꣣भ्या꣢३꣱दि꣢शः꣣ सू꣡रो꣢ अ꣣क्तु꣡ष्वा य꣢꣯मत् । त्वा꣢ यु꣣जा꣡ व꣢नेम꣣ त꣢त् ॥१२८॥

मा ꣢ । नः꣣ । इन्द्र । अभि꣢ । आ꣣दि꣡शः꣢ । आ꣣ । दि꣡शः꣢꣯ । सूरः꣢꣯ । अ꣣क्तु꣡षु꣢ । आ । य꣣मत् । त्वा꣢ । यु꣣जा꣢ । व꣣नेम । त꣢त् ॥१२८॥

Mantra without Swara
मा न इन्द्राभ्या३दिशः सूरो अक्तुष्वा यमत् । त्वा युजा वनेम तत् ॥

मा । नः । इन्द्र । अभि । आदिशः । आ । दिशः । सूरः । अक्तुषु । आ । यमत् । त्वा । युजा । वनेम । तत् ॥१२८॥

Samveda - Mantra Number : 128
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

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Meaning
हे (इन्द्र) परमवीर परमात्मन् अथवा राजन् ! (आदिशः) किसी भी दिशा से (सूरः) अवसर देखकर चुपके से आजानेवाला काम-क्रोधादि राक्षसगण या चोर आदि का समूह (अक्तुषु) अज्ञान-रात्रियों में अथवा अँधेरी रातों में (नः) हमें (मा) मत (अभि आ यमत्) आक्रान्त करे। यदि आक्रान्त करे तो (त्वा) आप (युजा) सहायक के द्वारा हम (तत्) उस कामादि राक्षसगण को अथवा चोरों के गिरोह को (वनेम) विनष्ट कर दें, समूल उन्मूलन करने में समर्थ हों ॥४॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥४॥
Essence
इस संसार में अज्ञानान्धकार में अथवा अँधियारी रात में पड़े हुए हम लोगों की न्यूनता देखकर जो कोई काम-क्रोधादि या चोर-लुटेरा आदि हम पर आक्रमण कर हमे विनष्ट करना चाहे, उसे परमात्मा और राजा की सहायता से हम धूल में मिला दें ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में यह प्रार्थना है कि इन्द्र की मैत्री प्राप्त कर हम आक्रान्ता शत्रुओं पर विजय पा लें।

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