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Samveda Mantra 126

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सुकक्षश्रुतकक्षौ Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣢द꣣द्य꣡ कच्च꣢꣯ वृत्रहन्नु꣣द꣡गा꣢ अ꣣भि꣡ सू꣢र्य । स꣢र्वं꣣ त꣡दि꣢न्द्र ते꣣ व꣡शे꣢ ॥१२६॥

य꣢त् । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । कत् । च꣣ । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । उद꣡गाः꣢ । उ꣣त् । अ꣡गाः꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । सू꣣र्य । स꣡र्व꣢꣯म् । तत् । इ꣣न्द्र । ते । व꣡शे꣢꣯ ॥१२६॥

Mantra without Swara
यदद्य कच्च वृत्रहन्नुदगा अभि सूर्य । सर्वं तदिन्द्र ते वशे ॥

यत् । अद्य । अ । द्य । कत् । च । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । उदगाः । उत् । अगाः । अभि । सूर्य । सर्वम् । तत् । इन्द्र । ते । वशे ॥१२६॥

Samveda - Mantra Number : 126
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

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Meaning
हे (वृत्रहन्) अविद्या, पाप दुराचार आदि, जो धर्म की गति को रोकनेवाले हैं, उनके विनाशक, (सूर्य) प्रकाशमय, प्रकाशदाता (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् परमात्मन् ! (अद्य) आज, आप (यत् कत् च) जिस किसी भी मनुष्य को अथवा जिस किसी भी मेरे मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियों आदि को (अभि) लक्ष्य करके (उदगाः) उदित होते हो, (सर्वं तत्) वे सभी मनुष्य अथवा वे सभी मन, बुद्धि आदि (ते) आपके (वशे) वश में हो जाते हैं ॥२॥
Essence
जैसे भौतिक सूर्य जिन किन्हीं भी पदार्थों के प्रति उदित होता है, वे सभी पदार्थ उसके प्रकाश से परिप्लुत हो जाते हैं, वैसे ही परमात्मारूप सूर्य जिसके अन्तःकरण में उदय को प्राप्त होता है, वह उसके दिव्य प्रकाश से परिपूर्ण होकर उसके वश में हो जाता है ॥२॥
Subject
कौन परमात्मा के वश में होता है, यह कहते हैं।