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Samveda Mantra 1256

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स देवरातः कृत्रिमो वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢ दे꣣वो꣡ अम꣢꣯र्त्यः पर्ण꣣वी꣡रि꣢व दीयते । अ꣣भि꣡ द्रोणा꣢꣯न्या꣣स꣡द꣢म् ॥१२५६॥

ए꣣षः꣢ । दे꣣वः꣢ । अ꣡म꣢꣯र्त्यः । अ । म꣣र्त्यः । पर्णवीः꣢ । प꣣र्ण । वीः꣢ । इ꣣व । दीयते । अभि꣢ । द्रो꣡णा꣢꣯नी । आ꣣स꣡द꣢म् । आ꣣ । स꣡द꣢꣯म् ॥१२५६॥

Mantra without Swara
एष देवो अमर्त्यः पर्णवीरिव दीयते । अभि द्रोणान्यासदम् ॥

एषः । देवः । अमर्त्यः । अ । मर्त्यः । पर्णवीः । पर्ण । वीः । इव । दीयते । अभि । द्रोणानी । आसदम् । आ । सदम् ॥१२५६॥

Samveda - Mantra Number : 1256
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 1;

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Meaning
(एषः) यह (अमर्त्यः) अमर, (देवः) कर्मफलों को भोगनेवाला जीवात्मा रूप सोम, कर्मों के अनुसार (द्रोणानि) देहरूप द्रोण कलशों में (अभि आसदम्) बैठने के लिए (पर्णवीः इव) पक्षी के समान (दीयते) उड़कर जाता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
पक्षी जैसे उड़ता हुआ एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर जाता है, वैसे ही यह जीवात्मा पहले शरीर को छोड़कर कर्मफल भोगने के लिए माता के गर्भ में दूसरे शरीर को प्राप्त करता है ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में जीवात्मा की गति वर्णित है।