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Samveda Mantra 1254

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पराशरः शाक्त्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म꣡त्सि꣢ वा꣣यु꣢मि꣣ष्ट꣢ये꣣ रा꣡ध꣢से नो꣣ म꣡त्सि꣢ मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा पू꣣य꣡मा꣢नः । म꣢त्सि꣣ श꣢र्धो꣣ मा꣡रु꣢तं꣣ म꣡त्सि꣢ दे꣣वा꣢꣫न्मत्सि꣣ द्या꣡वा꣢पृथि꣣वी꣡ दे꣢व सोम ॥१२५४॥

म꣡त्सि꣢꣯ । वा꣣यु꣢म् । इ꣣ष्ट꣡ये꣢ । रा꣡ध꣢꣯से । नः꣣ । म꣡त्सि꣢꣯ । मि꣣त्रा꣢ । मि꣣ । त्रा꣢ । व꣡रु꣢꣯णा । पू꣣य꣡मा꣢नः । म꣡त्सि꣢꣯ । श꣡र्धः꣢꣯ । मा꣡रु꣢꣯तम् । म꣡त्सि꣢꣯ । दे꣣वा꣢न् । म꣡त्सि꣢꣯ । द्या꣡वा꣢꣯ । पृ꣣थि꣡वीइति꣢ । दे꣣व । सोम ॥१२५४॥

Mantra without Swara
मत्सि वायुमिष्टये राधसे नो मत्सि मित्रावरुणा पूयमानः । मत्सि शर्धो मारुतं मत्सि देवान्मत्सि द्यावापृथिवी देव सोम ॥

मत्सि । वायुम् । इष्टये । राधसे । नः । मत्सि । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । पूयमानः । मत्सि । शर्धः । मारुतम् । मत्सि । देवान् । मत्सि । द्यावा । पृथिवीइति । देव । सोम ॥१२५४॥

Samveda - Mantra Number : 1254
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (देव) आनन्ददायक, (सोम) संसार के रचयिता परमात्मन् ! आप (नः) हमारी (इष्टये) अभीष्ट-सिद्धि के लिए और (राधसे) ऐश्वर्य के लिए (वायुम्) पवन को (मत्सि) हर्षित करते हो, (पूयमानः) प्राप्त किये जाते हुए आप (मित्रावरुणा) प्राण-अपान को (मत्सि) हर्षित करते हो, (मारुतं शर्धः) सैनिकों के बल को (मत्सि) हर्षित करते हो, (देवान्) विद्वान् जनों को (मत्सि) हर्षित करते हो, (द्यावापृथिवी) आकाश और भूमि को (मत्सि) हर्षित करते हो ॥२॥
Essence
जो यह प्रकृति में सूर्य, चन्द्र, पवन, भूमि आदियों में, समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदियों में और शरीर में जीवात्मा, मन, बुद्धि, प्राण आदियों में हर्ष, स्फूर्ति और कर्मनिष्ठा दिखायी देती है, वह सब परमात्मा द्वारा ही की हुई है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा का कर्म वर्णित है।