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Samveda Mantra 1252

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- जेता माधुच्छन्दसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इ꣢न्द्र꣣मी꣡शा꣢न꣣मो꣡ज꣢सा꣣भि꣡ स्तोमै꣢꣯रनूषत । स꣣ह꣢स्रं꣣ य꣡स्य꣢ रा꣣त꣡य꣢ उ꣣त꣢ वा꣣ स꣢न्ति꣣ भू꣡य꣢सीः ॥१२५२॥

इ꣡न्द्र꣢꣯म् । ई꣡शा꣢꣯नम् । ओ꣡ज꣢꣯सा । अ꣣भि꣡ । स्तो꣡मैः꣢꣯ । अ꣣नूषत । स꣣ह꣡स्र꣢म् । य꣡स्य꣢꣯ । रा꣣त꣡यः꣢ । उ꣣त꣢ । वा꣣ । स꣡न्ति꣢꣯ । भू꣡य꣢꣯सीः ॥१२५२॥

Mantra without Swara
इन्द्रमीशानमोजसाभि स्तोमैरनूषत । सहस्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसीः ॥

इन्द्रम् । ईशानम् । ओजसा । अभि । स्तोमैः । अनूषत । सहस्रम् । यस्य । रातयः । उत । वा । सन्ति । भूयसीः ॥१२५२॥

Samveda - Mantra Number : 1252
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 9;

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1 Bhashyas
Meaning
(ओजसा) बल वा प्रताप से (ईशानम्) जगत् के वा शरीर के शासक (इन्द्रम्) परमेश्वर वा जीवात्मा की सब लोग (स्तोमैः) उनके गुणवर्णन करनेवाले स्तोत्रों से (अभि अनूषत) स्तुति करते हैं, (यस्य) जिस परमेश्वर वा जीवात्मा के (सहस्रम्) हजार (उत वा) अथवा (भूयसीः) उससे भी अधिक (रातयः) दान (सन्ति) हैं ॥३॥
Essence
सबको योग्य है कि परमेश्वर की उपासना करके और जीवात्मा को उद्बोधन देकर उनके दानों को प्राप्त करें ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, जीवात्मा और राजा का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ नवम अध्याय में अष्टम खण्ड समाप्त ॥ नवम अध्याय समाप्त ॥ पञ्चम प्रपाठक में प्रथम अर्ध समाप्त ॥
Subject
आगे फिर परमात्मा और जीवात्मा का विषय है।