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Samveda Mantra 1249

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त्व꣡ꣳ हि शश्व꣢꣯तीना꣣मि꣡न्द्र꣢ ध꣣र्त्ता꣢ पु꣣रा꣡मसि꣢꣯ । ह꣣न्ता꣢꣫ दस्यो꣣र्म꣡नो꣢र्वृ꣣धः꣡ पति꣢꣯र्दि꣣वः꣢ ॥१२४९॥

त्वम् । हि । श꣡श्व꣢꣯तीनाम् । इ꣡न्द्र꣢꣯ । ध꣣र्त्ता꣢ । पु꣣रा꣢म् । अ꣡सि꣢꣯ । ह꣣न्ता꣢ । द꣡स्योः꣢꣯ । म꣡नोः꣢꣯ । वृ꣡धः꣢꣯ । प꣡तिः꣢꣯ । दि꣣वः꣢ ॥१२४९॥

Mantra without Swara
त्वꣳ हि शश्वतीनामिन्द्र धर्त्ता पुरामसि । हन्ता दस्योर्मनोर्वृधः पतिर्दिवः ॥

त्वम् । हि । शश्वतीनाम् । इन्द्र । धर्त्ता । पुराम् । असि । हन्ता । दस्योः । मनोः । वृधः । पतिः । दिवः ॥१२४९॥

Samveda - Mantra Number : 1249
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 9;

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Meaning
हे (इन्द्र) परमवीर जगदीश्वर वा राजन् ! (त्वं हि) आप निश्चय ही (शश्वतीनाम्) बहुत सी (पुराम्) शत्रु-नगरियों के (धर्ता) भेदन करनेवाले, (दस्योः) हिंसक शत्रु के (हन्ता) विनाशक, (मनोः) मननशील शान्तिप्रिय मनुष्य के (वृधः) बढ़ानेवाले और (दिवः) तेजस्वी जन के (पतिः) रक्षक (असि) हो ॥३॥
Essence
जैसे जगदीश्वर दुष्टों का भञ्जक और सज्जनों का रक्षक होता है, वैसे ही राजा को भी होना चाहिए ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर और राजा के वीरकर्मों का वर्णन करते हैं।

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