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Samveda Mantra 1245

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- उशना काव्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
क꣣वि꣡मि꣢व प्र꣣श꣢ꣳस्यं꣣ यं꣢ दे꣣वा꣢स꣣ इ꣡ति꣢ द्वि꣣ता꣢ । नि꣡ मर्त्ये꣢꣯ष्वाद꣣धुः꣢ ॥१२४५॥

क꣣वि꣢म् । इ꣣व । प्रश꣡ꣳस्य꣢म् । प्र꣣ । श꣡ꣳस्य꣢꣯म् । यम् । दे꣣वा꣡सः꣢ । इ꣡ति꣢꣯ । द्वि꣣ता꣢ । नि । म꣡र्त्ये꣢꣯षु । आ꣡दधुः꣢ । आ꣣ । दधुः꣢ ॥१२४५॥

Mantra without Swara
कविमिव प्रशꣳस्यं यं देवास इति द्विता । नि मर्त्येष्वादधुः ॥

कविम् । इव । प्रशꣳस्यम् । प्र । शꣳस्यम् । यम् । देवासः । इति । द्विता । नि । मर्त्येषु । आदधुः । आ । दधुः ॥१२४५॥

Samveda - Mantra Number : 1245
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 9;

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Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (कविम् इव) कवि के समान (प्रशंस्यम्) प्रशंसनीय (यम्) जिस अग्नि अर्थात् अग्रनायक परमात्मा को (देवासः इति) दिव्य गुणोंवाले योग-प्रशिक्षक वा योगी लोग (द्विता) पालनार्थ तथा शत्रुओं से रक्षार्थ इन दो प्रयोजनों के लिए (मर्त्येषु) योगाभ्यासी मनुष्यों में (नि आदधुः) योगविधि से अनुभव कराते हैं, उसकी मैं (स्तुषे) स्तुति करता हूँ। [यहाँ ‘स्तुषे’ पद पूर्व मन्त्र से लाया गया है ॥] द्वितीय—राजा के पक्ष में। (कविम् इव) कवि के समान (प्रशंस्यम्) प्रशंसनीय (यम्) जिस अग्नि अर्थात् अग्रनायक राजा को (देवासः इति) दिव्य गुणोंवाले पुरोहित लोग (द्विता) प्रजा के पालनार्थ तथा शत्रुओं से रक्षार्थ दोनों कर्मों के लिए (मर्त्येषु) प्रजाजनों के बीच (नि आदधुः) राजगद्दी पर स्थित करते हैं, उसकी मैं (स्तुषे) गुण-वर्णन-रूप स्तुति करता हूँ ॥२॥
Essence
जैसे ब्रह्माण्ड का सम्राट् परमेश्वर लोगों को पालता और उनके शत्रुओं को पराजित करता है, वैसे ही वही राष्ट्र में राजा होने योग्य है, जो प्रजाओं की पालना तथा शत्रुओं का पराजय कर सकता हो ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर परमात्मा और राजा का विषय वर्णित है।

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