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Samveda Mantra 1244

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- उशना काव्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्रे꣡ष्ठं꣢ वो꣣ अ꣡ति꣢थिꣳ स्तु꣣षे꣢ मि꣣त्र꣡मि꣢व प्रि꣣य꣢म् । अ꣢ग्ने꣣ र꣢थं꣣ न꣡ वेद्य꣢꣯म् ॥१२४४॥

प्रे꣡ष्ठ꣢꣯म् । वः꣣ । अ꣡ति꣢꣯थिम् । स्तु꣣षे꣢ । मि꣣त्र꣢म् । मि꣣ । त्र꣢म् । इ꣣व । प्रिय꣢म् । अ꣡ग्ने꣢꣯ । र꣡थ꣢꣯म् । न । वे꣡द्य꣢꣯म् ॥१२४४॥

Mantra without Swara
प्रेष्ठं वो अतिथिꣳ स्तुषे मित्रमिव प्रियम् । अग्ने रथं न वेद्यम् ॥

प्रेष्ठम् । वः । अतिथिम् । स्तुषे । मित्रम् । मि । त्रम् । इव । प्रियम् । अग्ने । रथम् । न । वेद्यम् ॥१२४४॥

Samveda - Mantra Number : 1244
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 9;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) जग के नेता परमात्मन् वा राष्ट्र के नेता राजन् ! (प्रेष्ठम्) अतिशय प्रिय, (अतिथिम्) अतिथि के समान सत्कार-योग्य, (मित्रम् इव) मित्र के समान (प्रियम्) तृप्तिप्रदाता और (रथं न) रथ के समान (वेद्यम्) प्राप्तव्य (वः) आपकी मैं (स्तुषे) स्तुति करता हूँ अर्थात् आपके गुणों का वर्णन करता हूँ ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
जैसे लोग परमात्मा की पूजा करें, वैसे ही राजा का भी सत्कार करें और जैसे परमात्मा लोगों को तृप्ति देता है, वैसे ही राजा भी प्रजाओं को तृप्त करे ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ५ क्रमाङ्क पर परमात्मा की स्तुति के विषय में की जा चुकी है। यहाँ परमात्मा और राजा दोनों का विषय दर्शाते हैं।