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Samveda Mantra 1242

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
शु꣣क्रः꣡ प꣢वस्व दे꣣वे꣡भ्यः꣢ सोम दि꣣वे꣡ पृ꣢थि꣣व्यै꣡ शं च꣢꣯ प्र꣣जा꣡भ्यः꣢ ॥१२४२॥

शु꣣क्रः꣢ । प꣣वस्व । देवे꣡भ्यः꣢꣯ । सो꣣म । दिवे꣢ । पृ꣣थिव्यै꣢ । शम् । च꣣ । प्रजा꣡भ्यः꣢ । प्र꣣ । जा꣡भ्यः꣢꣯ ॥१२४२॥

Mantra without Swara
शुक्रः पवस्व देवेभ्यः सोम दिवे पृथिव्यै शं च प्रजाभ्यः ॥

शुक्रः । पवस्व । देवेभ्यः । सोम । दिवे । पृथिव्यै । शम् । च । प्रजाभ्यः । प्र । जाभ्यः ॥१२४२॥

Samveda - Mantra Number : 1242
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 8;

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Meaning
हे (सोम) जगत्स्रष्टा परमात्मन् ! (शुक्रः) तेजस्वी और पवित्र आप (देवेभ्यः) दिव्य गुणों से युक्त जनों के लिए (पवस्व) तेज और पवित्रता को प्रवाहित करो। (दिवे) सूर्य के लिए, (पृथिव्यै) भूलोक के लिए और (प्रजाभ्यः) प्रजाननों के लिए (शम्) कल्याणकारी होवो ॥२॥
Essence
यथाशक्ति परमात्मा के गुणों को अपने आत्मा में धारण करके हम तेज, पवित्रता और शान्ति प्राप्त कर सकते हैं ॥२॥
Subject
अब परमात्मा से प्रार्थना करते हैं।

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