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Samveda Mantra 1241

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व सोम म꣣हा꣡न्त्स꣢मु꣣द्रः꣢ पि꣣ता꣢ दे꣣वा꣢नां꣣ वि꣢श्वा꣣भि꣡ धाम꣢꣯ ॥१२४१॥

प꣡व꣢꣯स्व । सो꣣म । महा꣢न् । स꣣मुद्रः꣢ । स꣣म् । उद्रः꣢ । पि꣣ता꣢ । दे꣣वा꣢ना꣡म् । वि꣡श्वा꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । धा꣡म꣢꣯ ॥१२४१॥

Mantra without Swara
पवस्व सोम महान्त्समुद्रः पिता देवानां विश्वाभि धाम ॥

पवस्व । सोम । महान् । समुद्रः । सम् । उद्रः । पिता । देवानाम् । विश्वा । अभि । धाम ॥१२४१॥

Samveda - Mantra Number : 1241
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 8;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सोम) आनन्दरस के भण्डार परमात्मन् ! आप (महान् समुद्रः) विशाल बादल हो, (देवानाम्) दिव्यगुणों के (पिता) उत्पादक और पालक हो। आप (विश्वा धाम अभि) सब हृदय-धामों को लक्ष्य करके (पवस्व) बरसो ॥१॥ यहाँ सोम परमात्मा में मेघत्व (समुद्रत्व) का आरोप होने से रूपक अलङ्कार है ॥१॥
Essence
जैसे बादल भूमि पर बरस कर वनस्पति आदि को उत्पन्न करता है, वैसे ही परमेश्वर आनन्दवर्षा करके दिव्यगुणों को सृजता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ४२९ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ पर फिर परमात्मा का विषय कहते हैं।