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Samveda Mantra 1235

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- निध्रुविः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व दे꣣व꣡ आ꣢यु꣣ष꣡गिन्द्रं꣢꣯ गच्छतु ते꣣ म꣡दः꣢ । वा꣣यु꣡मा रो꣢꣯ह꣣ ध꣡र्म꣢णा ॥१२३५॥

प꣡व꣢꣯स्व । दे꣣वः꣢ । आ꣣युष꣢क् । आ꣣यु । स꣢क् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । ग꣣च्छतु । ते । म꣡दः꣢꣯ । वा꣣यु꣢म् । आ । रो꣣ह । ध꣡र्म꣢꣯णा ॥१२३५॥

Mantra without Swara
पवस्व देव आयुषगिन्द्रं गच्छतु ते मदः । वायुमा रोह धर्मणा ॥

पवस्व । देवः । आयुषक् । आयु । सक् । इन्द्रम् । गच्छतु । ते । मदः । वायुम् । आ । रोह । धर्मणा ॥१२३५॥

Samveda - Mantra Number : 1235
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 8;

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Meaning
हे सोम ! हे रसमय परमात्मन् ! (देवः) आनन्ददायक आप (आयुषक्) आयु भर (पवस्व) आनन्द-रस को प्रवाहित करते रहो। (ते) आपका (मदः) आनन्द (इन्द्रम्) जीवात्मा को (गच्छतु) प्राप्त हो। आप (धर्मणा) अपने गुण-कर्म-स्वभाव के साथ (वायुम्) हमारे गतिशील मन पर (आरोह) सवार हो जाओ, अभिप्राय यह है कि मन को अपने प्रभाव से प्रभावित करो ॥१॥
Essence
परमेश्वर के उपासकों के आत्मा, मन, बुद्धि आदि परम आनन्द के प्रवाह से परिप्लुत हो जाते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ४८३ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में व्याख्यात की गयी थी। यहाँ भी प्रकारान्तर से उसी विषय का निरूपण किया जा रहा है।

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