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Samveda Mantra 1233

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भर्गः प्रागाथः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
उ꣣भ꣡य꣢ꣳ शृ꣣ण꣡व꣢च्च न꣣ इ꣡न्द्रो꣢ अ꣣र्वा꣢गि꣣दं꣡ वचः꣢꣯ । स꣣त्रा꣡च्या꣢ म꣣घ꣢वा꣣न्त्सो꣡म꣢पीतये धि꣣या꣡ शवि꣢꣯ष्ठ꣣ आ꣡ गम꣢त् ॥१२३३॥

उ꣣भ꣡य꣢म् । शृ꣣ण꣡व꣢त् । च꣣ । नः । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । अ꣣र्वा꣢क् । इ꣣द꣢म् । व꣡चः꣢꣯ । स꣣त्रा꣡च्या꣢ । स꣣त्रा꣢ । च्या꣣ । मघ꣡वा꣢न् । सो꣡म꣢꣯पीतये । सो꣡म꣢꣯ । पी꣣तये । धिया꣢ । श꣡वि꣢꣯ष्ठ । आ । ग꣣मत् ॥१२३३॥

Mantra without Swara
उभयꣳ शृणवच्च न इन्द्रो अर्वागिदं वचः । सत्राच्या मघवान्त्सोमपीतये धिया शविष्ठ आ गमत् ॥

उभयम् । शृणवत् । च । नः । इन्द्रः । अर्वाक् । इदम् । वचः । सत्राच्या । सत्रा । च्या । मघवान् । सोमपीतये । सोम । पीतये । धिया । शविष्ठ । आ । गमत् ॥१२३३॥

Samveda - Mantra Number : 1233
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 7;

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1 Bhashyas
Meaning
(इन्द्रः) विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्य (नः अर्वाक्) हमारे अभिमुख होकर (इदम्) इस हमसे सुनाए जाते हुए (उभयं वचः) पद्यात्मक और गद्यात्मक दोनों प्रकार के पढ़ाए हुए शास्त्र-वचनों को (शृणवत्) सुने। (मघवान्) विद्यादान देनेवाला, (शविष्ठः) विद्या और चरित्र से बलवान् वह आचार्य (सत्राच्या) सत्य का अनुसरण करनेवाली (धिया) बुद्धि वा क्रिया से (सोमपीतये) हमें ज्ञानरस वा ब्रह्मानन्दरस पिलाने के लिए (आगमत्) हमारे पास आये ॥१॥
Essence
गुरुओं को चाहिए कि प्रेम से छात्रों को पढ़ायें और प्रतिदिन पढ़ाये हुए पाठ को अगले दिन सुनें, जिससे इसकी परीक्षा हो सके कि छात्रों ने यह पाठ याद कर लिया या नहीं। सिखाये हुए योगाङ्गों की भी समय-समय पर परीक्षा लें, जिससे छात्र समाधि में ब्रह्मानन्द की प्राप्ति के योग्य हो सकें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में २९० क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में की गयी थी। यहाँ आचार्य का विषय कहा गया है।