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Samveda Mantra 1211

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु꣡रः꣢ स꣣द्य꣢ इ꣣त्था꣡धि꣢ये꣣ दि꣡वो꣢दासाय꣣ श꣡म्ब꣢रम् । अ꣢ध꣣ त्यं꣢ तु꣣र्व꣢शं꣣ य꣡दु꣢म् ॥१२११॥

पु꣡रः꣢꣯ । स꣣द्यः꣢ । स꣣ । द्यः꣢ । इ꣣त्था꣡धि꣢ये । इ꣣त्था꣢ । धि꣣ये । दि꣡वो꣢꣯दासाय । दि꣡वः꣢꣯ । दा꣣साय । श꣡म्ब꣢꣯रम् । शम् । ब꣣रम् । अ꣡ध꣢꣯ । त्यम् । तु꣣र्व꣡श꣢म् । य꣡दु꣢꣯म् ॥१२११॥

Mantra without Swara
पुरः सद्य इत्थाधिये दिवोदासाय शम्बरम् । अध त्यं तुर्वशं यदुम् ॥

पुरः । सद्यः । स । द्यः । इत्थाधिये । इत्था । धिये । दिवोदासाय । दिवः । दासाय । शम्बरम् । शम् । बरम् । अध । त्यम् । तुर्वशम् । यदुम् ॥१२११॥

Samveda - Mantra Number : 1211
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 5;

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1 Bhashyas
Meaning
हे इन्दु अर्थात् तेज से प्रदीप्त परमात्मन् वा वीरजन ! तुम (इत्थाधिये) सत्यकर्मोंवाले, (दिवोदासाय) विद्या और धर्म के प्रकाश के दाता मनुष्य के हितार्थ (सद्यः) शीघ्र ही (शम्बरम्) शान्ति में विघ्न डालनेवाले शत्रु को, (अध) और (त्यम्) उस (तुर्वशम्) हिंसा करने के इच्छुक शत्रु को तथा (यदुम्) धर्म के फैलने में रुकावट डालनेवाले शत्रु को और (पुरः) उनकी नगरियों को (अवाहन्) नष्ट-भ्रष्ट कर दो [यहाँ ‘अवाहन्’ पद पूर्व मन्त्र से लाया गया है।] ॥२॥
Essence
परमात्मा की कृपा से और वीरों के शौर्यकर्म से सुख, शान्ति, धर्म-कर्म आदि में रुकावट डालनेवाले शत्रुओं की सदा ही पराजय और धार्मिक जनों का उत्कर्ष करना चाहिए ॥२॥ यहाँ सायणाचार्य के मत में दिवोदास नाम का कोई राजा था और यदु, तुर्वश तथा शम्बर उसके विरोधी राजा थे, जिन्हें सोमरस पीकर मस्त हुए इन्द्र ने दिवोदास के हित के लिए वश में कर लिया था। किन्तु यह सङ्गत नहीं है, क्योंकि सृष्टि के आदि में प्रकट हुए वेद में परवर्ती राजाओं आदि का इतिहास नहीं हो सकता, यह सुधी जनों को निश्चय मानना चाहिए ॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर से प्रार्थना तथा वीर मनुष्य को उद्बोधन है।