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Samveda Mantra 1202

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नि꣡त्य꣢स्तोत्रो꣣ व꣢न꣣स्प꣡ति꣢र्धे꣣ना꣢म꣣न्तः꣡ स꣢ब꣣र्दु꣡घा꣢म् । हि꣣न्वानो꣡ मानु꣢꣯षा यु꣣जा꣢ ॥१२०२॥

नि꣡त्य꣢꣯स्तोत्रः । नि꣡त्य꣢꣯ । स्तो꣣त्रः । व꣢न꣣स्प꣡तिः꣢ । धे꣣ना꣢म् । अ꣣न्त꣡रिति꣢ । स꣣बर्दु꣡घा꣢म् । स꣣बः । दु꣡घा꣢꣯म् । हि꣡न्वानः꣢ । मा꣡नु꣢꣯षा । यु꣣जा꣢ ॥१२०२॥

Mantra without Swara
नित्यस्तोत्रो वनस्पतिर्धेनामन्तः सबर्दुघाम् । हिन्वानो मानुषा युजा ॥

नित्यस्तोत्रः । नित्य । स्तोत्रः । वनस्पतिः । धेनाम् । अन्तरिति । सबर्दुघाम् । सबः । दुघाम् । हिन्वानः । मानुषा । युजा ॥१२०२॥

Samveda - Mantra Number : 1202
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 3;

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Meaning
(नित्यस्तोत्रः) सन्ध्योपासनारूप नित्यकर्म द्वारा स्तुति करने योग्य, (वनस्पतिः) तेजों का अधिपति सोम परमात्मा, (मानुषा युजा) मनुष्य स्त्री-पुरुषों के (अन्तः) अन्तःकरण में (सबर्दुघाम्) आनन्द-रस को दुहनेवाली (धेनाम्) दिव्यवाणी को (हिन्वानः) प्रेरित करता रहता है ॥७॥ यहाँ ‘दुघाम्’ कहने से धेना (वाणी) में गोत्व का आरोप व्यङ्ग्य है ॥७॥
Essence
परमेश्वर की उपासना का यही लाभ है कि दिव्य आनन्द और शुभकर्मों में उत्साह प्राप्त होता है ॥७॥
Subject
अगले मन्त्र में यह वर्णन है कि परमात्मा स्तोता का कैसे उपकार करता है।

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