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Samveda Mantra 1194

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
जु꣢ष्ट꣣ इ꣡न्द्रा꣢य मत्स꣣रः꣡ पव꣢꣯मानः꣣ क꣡नि꣢क्रदत् । वि꣢श्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣡षो꣢ जहि ॥११९४॥

जु꣡ष्टः꣢꣯ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । म꣣त्सरः꣡ । प꣡व꣢꣯मानः । क꣡निक्रदत् । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ । ज꣣हि ॥११९४॥

Mantra without Swara
जुष्ट इन्द्राय मत्सरः पवमानः कनिक्रदत् । विश्वा अप द्विषो जहि ॥

जुष्टः । इन्द्राय । मत्सरः । पवमानः । कनिक्रदत् । विश्वाः । अप । द्विषः । जहि ॥११९४॥

Samveda - Mantra Number : 1194
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 2;

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Meaning
हे सोम अर्थात् प्रेरक परमात्मन् ! (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए (जुष्टः) प्रिय, (मत्सरः) आनन्दजनक, (पवमानः) पवित्रता देते हुए, (कनिक्रदत्) उपदेश करते हुए आप (विश्वाः द्विषः) सब द्वेषवृत्तियों को वा द्वेष करनेवाली काम, क्रोध आदि की सेनाओं को (अप जहि) विनष्ट कर दो ॥८॥
Essence
परमात्मा की उपासना से अन्तरात्मा में पवित्रता और आनन्द उत्पन्न होते हैं तथा द्वेषवृत्तियाँ अपने आप नष्ट हो जाती हैं ॥८॥
Subject
अब परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं।

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