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Samveda Mantra 1193

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वा꣣श्रा꣡ अ꣢र्ष꣣न्ती꣡न्द꣢वो꣣ऽभि꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न मा꣣त꣡रः꣢ । द꣣धन्विरे꣡ गभ꣢꣯स्त्योः ॥११९३॥

वा꣣श्राः꣢ । अ꣣र्षन्ति । इ꣡न्द꣢꣯वः । अ꣣भि꣢ । व꣣त्स꣢म् । न । मा꣣त꣡रः꣢ । द꣣धन्विरे꣢ । ग꣡भ꣢꣯स्त्योः ॥११९३॥

Mantra without Swara
वाश्रा अर्षन्तीन्दवोऽभि वत्सं न मातरः । दधन्विरे गभस्त्योः ॥

वाश्राः । अर्षन्ति । इन्दवः । अभि । वत्सम् । न । मातरः । दधन्विरे । गभस्त्योः ॥११९३॥

Samveda - Mantra Number : 1193
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 2;

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Meaning
(वाश्राः) रँभाती हुई (मातरः) गायें (वत्सं न) जैसे बछड़े की ओर जाती हैं, वैसे ही (वाश्राः) उपदेश देते हुए (इन्दवः) रस से भिगोनेवाले ब्रह्मानन्द-रस (वत्सम् अभि) प्रिय उपासक की ओर (अर्षन्ति) जाते हैं और (गभस्त्योः) बाहुओं में (दधन्विरे) धारण किये जाते हैं अर्थात् ब्रह्मानन्द-रसों की प्राप्ति होने पर उपासक भुजाओं से कर्म करने में संलग्न हो जाता है ॥७॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥७॥
Essence
ब्रह्मानन्द भी सत्कर्मों के बिना शोभा नहीं पाते ॥७॥
Subject
अगले मन्त्र में परमानन्द की प्राप्ति का वर्णन है।

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