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Samveda Mantra 1191

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡त्या꣢ हिया꣣ना꣢꣫ न हे꣣तृ꣢भि꣣र꣡सृ꣢ग्रं꣣ वा꣡ज꣢सातये । वि꣢꣫ वार꣣म꣡व्य꣢मा꣣श꣡वः꣢ ॥११९१॥

अ꣡त्याः꣢꣯ । हि꣣यानाः꣢ । न । हे꣣तृ꣡भिः꣢ । अ꣡सृ꣢꣯ग्रम् । वा꣡ज꣢꣯सातये । वा꣡ज꣢꣯ । सा꣣तये । वि꣢ । वा꣡र꣢꣯म् । अ꣡व्य꣢꣯म् । आ꣣श꣡वः꣢ ॥११९१॥

Mantra without Swara
अत्या हियाना न हेतृभिरसृग्रं वाजसातये । वि वारमव्यमाशवः ॥

अत्याः । हियानाः । न । हेतृभिः । असृग्रम् । वाजसातये । वाज । सातये । वि । वारम् । अव्यम् । आशवः ॥११९१॥

Samveda - Mantra Number : 1191
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
(वाजसातये) संग्राम के लिए (हेतृभिः) प्रेरक योद्धाओं से (हियानाः) प्रेरित किये जाते हुए (अत्याः न) घोड़ों के समान (हेतृभिः) प्रेरक योगाभ्यासों से (हियानाः) प्रेरित किये जाते हुए (आशवः) वेगगामी सोम अर्थात् परमानन्दरस (वाजसातये) बल देने के लिए (वारम्) दोषनिवारक, (अव्यम्) अविनश्वर जीवात्मा के प्रति (वि असृग्रम्) छोड़े जा रहे हैं ॥५॥ यहाँ श्लिष्टोपमा अलङ्कार है ॥५॥
Essence
शीघ्रगामी बलवान् घोड़े जैसे युद्ध में विजय के साधन बनते हैं, वैसे ही योगाभ्यास से उत्पन्न किये गए परम आनन्द बल-प्रदान में कारण बनते हैं ॥५॥
Subject
अब आनन्द-रसों का वर्णन करते हैं।