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Samveda Mantra 1186

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वृ꣣ष्टिं꣢ दि꣣वः꣡ परि꣢꣯ स्रव द्यु꣣म्नं꣡ पृ꣢थि꣣व्या꣡ अधि꣢꣯ । स꣡हो꣢ नः सोम पृ꣣त्सु꣡ धाः꣢ ॥११८६॥

वृ꣣ष्टि꣢म् । दि꣣वः꣡ । प꣡रि꣢꣯ । स्र꣣व । द्युम्न꣢म् । पृ꣣थिव्याः꣢ । अ꣡धि꣢꣯ । स꣡हः꣢꣯ । नः꣣ । सोम । पुत्सु꣢ । धाः꣢ ॥११८६॥

Mantra without Swara
वृष्टिं दिवः परि स्रव द्युम्नं पृथिव्या अधि । सहो नः सोम पृत्सु धाः ॥

वृष्टिम् । दिवः । परि । स्रव । द्युम्नम् । पृथिव्याः । अधि । सहः । नः । सोम । पुत्सु । धाः ॥११८६॥

Samveda - Mantra Number : 1186
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सोम) सब सुखों के प्रेरक परमात्मन् ! आप (दिवः) दिव्य आनन्दमय कोश से (वृष्टिम्) आनन्द की वर्षा (परिस्रव) बरसाओ, (पृथिव्याः अधि) पृथिवी पर (द्युम्नम्) यश और तेज (परिस्रव) बहाओ। (नः) हमारी (पृत्सु) सेनाओं में (सहः) साहस और बल (धाः) धारण कराओ ॥९॥
Essence
जगदीश्वर जैसे अन्तरिक्ष से जलधाराएँ बरसाता है, वैसे ही अपने आनन्द के कोश से आनन्द की धाराएँ बरसाए। जैसे वह पृथिवी में स्वर्ण आदि धन स्थापित करता है, वैसे ही राष्ट्र में कीर्ति और तेजस्विता स्थापित करे। जैसे वह राष्ट्र की सेनाओं में साहस प्रेरित करता है, वैसे ही हमारी सत्य, अहिंसा आदि की दिव्य सेनाओं में बल और वेग धारण कराये ॥९॥ इस खण्ड में परमात्मा के आविर्भाव, उसके गुण-कर्मों, ब्रह्मानन्द-रस तथा जीवात्मा का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ नवम अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
Subject
आगे फिर वही विषय है।