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Samveda Mantra 1172

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- अत्रिर्भौमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
य꣡दि꣢न्द्र चित्र म इ꣣ह꣢꣫ नास्ति꣣ त्वा꣡दा꣢तमद्रिवः । रा꣢ध꣣स्त꣡न्नो꣢ विदद्वस उभयाह꣣स्त्या꣡ भ꣢र ॥११७२॥

य꣢त् । इ꣣न्द्र । चित्र । मे । इह꣢ । न । अ꣡स्ति꣢꣯ । त्वा꣡दा꣢꣯तम् । त्वा । दा꣣तम् । अद्रिवः । अ । द्रिवः । रा꣡धः꣢꣯ । तत् । नः꣣ । विदद्वसो । विदत् । वसो । उभयाहस्ति । आ । भर ॥११७२॥

Mantra without Swara
यदिन्द्र चित्र म इह नास्ति त्वादातमद्रिवः । राधस्तन्नो विदद्वस उभयाहस्त्या भर ॥

यत् । इन्द्र । चित्र । मे । इह । न । अस्ति । त्वादातम् । त्वा । दातम् । अद्रिवः । अ । द्रिवः । राधः । तत् । नः । विदद्वसो । विदत् । वसो । उभयाहस्ति । आ । भर ॥११७२॥

Samveda - Mantra Number : 1172
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 6;

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Meaning
हे (चित्र) अद्भुत, (अद्रिवः) अविनष्ट गुणोंवाले (विदद्वसो) प्राप्त ऐश्वर्यवाले (इन्द्र) जगदीश्वर वा आचार्य ! (त्वादातम्) आपसे शोधित (यत् राधः) जो आत्मबल, धर्म, विद्या आदि का धन (मे) मेरे पास (इह) यहाँ (न अस्ति) नहीं है, (तत्) वह धन, आप (उभयाहस्ति) जैसे दोनों हाथों से किसी को दिया जाता है, वैसे (नः) हमें (आ भर) दीजिए ॥१॥
Essence
परमेश्वर और आचार्य की कृपा से शुद्ध दिव्य और भौतिक धन के हम अधिपति हो जाएँ ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ३४५ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में की गयी थी। यहाँ परमात्मा और आचार्य का विषय दर्शाया जा रहा है।

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