Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 1161

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः Chhand- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स꣢ वा꣣꣬ज्य꣢꣯क्षाः स꣣ह꣡स्र꣢रेता अ꣣द्भि꣡र्मृ꣢जा꣣नो꣡ गोभिः꣢꣯ श्रीणा꣣नः꣢ ॥११६१॥

सः । वा꣣जी꣢ । अ꣣क्षारि꣡ति꣢ । स꣣ह꣡स्र꣢रेताः । स꣣ह꣡स्र꣢ । रे꣣ताः । अद्भिः꣢ । मृ꣣जानः꣢ । गो꣡भिः꣢꣯ । श्री꣣णानः꣢ ॥११६१॥

Mantra without Swara
स वाज्यक्षाः सहस्ररेता अद्भिर्मृजानो गोभिः श्रीणानः ॥

सः । वाजी । अक्षारिति । सहस्ररेताः । सहस्र । रेताः । अद्भिः । मृजानः । गोभिः । श्रीणानः ॥११६१॥

Samveda - Mantra Number : 1161
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 5;

Bhashya

More bhashyas
Meaning
(वाजी) वेगवान्, (सहस्ररेताः) सहस्र वीर्यवाला, (अद्भिः) शुभकर्मों से (मृजानः) जीवात्मा को अलंकृत करता हुआ, (गोभिः) विवेक के प्रकाशों से (श्रीणानः) जीवात्मा को परिपक्व करता हुआ (सः) वह सोम अर्थात् ज्ञान-रस (अक्षाः) आचार्य के पास से क्षरित होता है ॥२॥
Essence
आचार्य के पास से जो ज्ञान-रस शिष्य द्वारा प्राप्त किया जाता है, वह उसके कर्मों को शुद्ध करता है और उसके अन्तरात्मा को परिपक्व करता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर उसी विषय को कहा गया है।

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.