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Samveda Mantra 1157

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पर्वतनारदौ काण्वौ शिखण्डिन्यावप्सरसौ काश्यपौ वा Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स꣡खा꣢य꣣ आ꣡ नि षी꣢꣯दत पुना꣣ना꣢य꣣ प्र꣡गा꣢यत । शि꣢शुं꣣ न꣢ य꣣ज्ञैः꣡ परि꣢꣯ भूषत श्रि꣣ये꣢ ॥११५७॥

स꣡खा꣣यः । स । खा꣣यः । आ꣢ । नि । सी꣣दत । पुनाना꣡य꣢ । प्र । गा꣣यत । शि꣡श꣢꣯म् । न । य꣣ज्ञैः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । भू꣣षत । श्रिये꣢ ॥११५७॥

Mantra without Swara
सखाय आ नि षीदत पुनानाय प्रगायत । शिशुं न यज्ञैः परि भूषत श्रिये ॥

सखायः । स । खायः । आ । नि । सीदत । पुनानाय । प्र । गायत । शिशम् । न । यज्ञैः । परि । भूषत । श्रिये ॥११५७॥

Samveda - Mantra Number : 1157
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 5;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सखायः) साथियो ! तुम (आ निषीदत) आकर बैठो, (पुनानाय) मन, बुद्धि आदि को पवित्र करनेवाले अपने अन्तरात्मा के लिए (प्र गायत) उद्बोधन-गीत गाओ और (श्रिये) शोभा के लिए उस सोम नामक अन्तरात्मा को (यज्ञैः) देवपूजा, सङ्गतिकरण, दान आदियों से (परि भूषत) अलंकृत करो, (शिशुं न) जैसे शिशु को सुरम्य वस्त्र, आभूषण आदियों से अलंकृत करते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
जीवात्मा में महान् शक्ति निहित है। उद्बोधन-गीतों से उस की शक्ति को जगाना चाहिए और नवीन-नवीन गुणों से तथा यज्ञ-भावनाओं से जीवात्मा को अलंकृत करना चाहिए ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ५६८ क्रमाङ्क पर परमात्मा की उपासना के विषय में की जा चुकी है। यहाँ अपने अन्तरात्मा का विषय वर्णित करते हैं।