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Samveda Mantra 1150

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢ इ꣣द्ध꣢ आ꣣वि꣡वा꣢सति सु꣣म्न꣡मिन्द्र꣢꣯स्य꣣ म꣡र्त्यः꣢ । द्यु꣣म्ना꣡य꣢ सु꣣त꣡रा꣢ अ꣣पः꣢ ॥११५०॥

यः । इ꣣द्धे꣢ । आ꣣वि꣢वा꣢सति । आ꣣ । वि꣡वा꣢꣯सति । सु꣣म्न꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । म꣡र्त्यः꣢꣯ । द्यु꣣म्ना꣡य꣢ । सु꣣त꣡राः꣢ । सु꣣ । त꣡राः꣢꣯ । अ꣣पः꣢ ॥११५०॥

Mantra without Swara
य इद्ध आविवासति सुम्नमिन्द्रस्य मर्त्यः । द्युम्नाय सुतरा अपः ॥

यः । इद्धे । आविवासति । आ । विवासति । सुम्नम् । इन्द्रस्य । मर्त्यः । द्युम्नाय । सुतराः । सु । तराः । अपः ॥११५०॥

Samveda - Mantra Number : 1150
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 3;

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Meaning
(यः मर्त्यः) जो मनुष्य (इद्धे) अग्नि के प्रदीप्त होने पर (इन्द्रस्य) परमात्मा के (सुम्नम्) सुखदायक दान की (आ विवासति) प्रशंसा करता है, वह (द्युम्नाय) तेज और यश के लिए (अपः) विकट भी कर्मों को (सुतराः) आसानी से सिद्ध होनेवाला कर लेता है ॥२॥
Essence
प्रज्वलित अग्नि में उसकी अपनी ज्योति नहीं है, प्रत्युत परमात्मा की ही है, ऐसा जो मानता है, वह परमात्मा का आराधक होता हुआ तेजस्वी और यशस्वी बनता है। पर जो भौतिकवादी होता है, वह भौतिक पदार्थों में ही रमता हुआ भोगों से ही भोगा जाता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि अग्नि में परमेश्वर की ही दी हुई ज्योति है।

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