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Samveda Mantra 1130

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣢ यु꣣जा꣢ वा꣣चो꣡ अ꣢ग्रि꣣यो꣡ वृषो꣢꣯ अचिक्रद꣣द्व꣡ने꣢ । स꣢द्मा꣣भि꣢ स꣣त्यो꣡ अ꣢ध्व꣣रः꣢ ॥११३०॥

प्र । यु꣣जा꣢ । वा꣣चः꣢ । अ꣣ग्रियः꣢ । वृ꣡षा꣢꣯ । उ꣣ । अचिक्रदत् । व꣡ने꣢꣯ । स꣡द्म꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । स꣣त्यः꣢ । अ꣣ध्व꣢रः ॥११३०॥

Mantra without Swara
प्र युजा वाचो अग्रियो वृषो अचिक्रदद्वने । सद्माभि सत्यो अध्वरः ॥

प्र । युजा । वाचः । अग्रियः । वृषा । उ । अचिक्रदत् । वने । सद्म । अभि । सत्यः । अध्वरः ॥११३०॥

Samveda - Mantra Number : 1130
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
(अग्रियः) श्रेष्ठ, (वृषा) ज्ञान की वर्षा करनेवाला, (सत्यः) सत्यनिष्ठ, (अध्वरः) यज्ञमय जीवनवाला विद्वान् गुरु (वने) जंगल में (सद्म अभि) गुरुकुलरूप घर में (वाचः युजा) वाणी के योग से (उ) निश्चय ही (प्र अचिक्रदत्) शिष्यों को कर्त्तव्यों का उपदेश करता है ॥३॥
Essence
पर्वतों के एकान्त में नदियों के सङ्गम पर गुरुकुलों का संचालन करते हुए सत्यनिष्ठ गुरु शिष्यों को पढ़ाकर विद्वान्, कर्तव्यपरायण और सदाचारी करें ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में यह बताया गया है कि कैसा गुरु क्या करता है।