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Samveda Mantra 1129

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣢꣫ धारा꣣ म꣡धो꣢ अग्रि꣣यो꣢ म꣣ही꣢र꣣पो꣡ वि गा꣢꣯हते । ह꣣वि꣢र्ह꣣विः꣢षु꣣ व꣡न्द्यः꣢ ॥११२९॥

प्र । धा꣡रा꣢꣯ । म꣡धोः꣢꣯ । अ꣣ग्रियः꣢ । म꣣हीः꣢ । अ꣣पः꣢ । वि । गा꣣हते । हविः꣢ । ह꣣वि꣡ष्षु꣢ । व꣡न्द्यः꣢꣯ ॥११२९॥

Mantra without Swara
प्र धारा मधो अग्रियो महीरपो वि गाहते । हविर्हविःषु वन्द्यः ॥

प्र । धारा । मधोः । अग्रियः । महीः । अपः । वि । गाहते । हविः । हविष्षु । वन्द्यः ॥११२९॥

Samveda - Mantra Number : 1129
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
(अग्रियः) अगुआ श्रेष्ठ, (हविःषु) हवि देनेवालों में (हविः) उत्कृष्ट हवि देनेवाला, (वन्द्यः) वन्दनीय सोम अर्थात् ज्ञान के उत्पादक विद्वान् (महीः अपः) महान् कर्मों को (विगाहते) आलोडित करता है अर्थात् ज्ञान के अनुकूल कर्मों का आचरण करता है। उसके पास से (मधोः) मधुर ज्ञानरस की (धारा) धारा (प्र) प्रवाहित होती है ॥२॥
Essence
वही विद्वान् प्रशंसनीय है, जो ज्ञान के अनुकूल कर्म भी करता है और सबके लिए ज्ञान की मधुर धाराएँ बहाता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः विद्वान् का विषय है।