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Samveda Mantra 1126

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ना꣢भा꣣ ना꣡भिं꣢ न꣣ आ꣡ द꣢दे꣣ च꣡क्षु꣢षा꣣ सू꣡र्यं꣢ दृ꣣शे꣢ । क꣣वे꣡रप꣢꣯त्य꣣मा꣡ दु꣢हे ॥११२६॥

ना꣡भा꣢꣯ । ना꣡भि꣢꣯म् । नः꣣ । आ꣢ । द꣣दे । च꣡क्षु꣢꣯षा । सू꣡र्य꣢꣯म् । दृ꣡शे꣢ । क꣣वेः꣢ । अ꣡प꣢꣯त्यम् । आ । दु꣣हे ॥११२६॥

Mantra without Swara
नाभा नाभिं न आ ददे चक्षुषा सूर्यं दृशे । कवेरपत्यमा दुहे ॥

नाभा । नाभिम् । नः । आ । ददे । चक्षुषा । सूर्यम् । दृशे । कवेः । अपत्यम् । आ । दुहे ॥११२६॥

Samveda - Mantra Number : 1126
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 1;

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Meaning
मैं गुरु द्वारा निर्दिष्ट उपाय से (नाभा) केन्द्रभूत अन्तरात्मा में (नः) अपने (नाभिम्) केन्द्रभूत परमात्मा को (आ ददे) ग्रहण करता हूँ, (चक्षुषा) अन्दर की आँख से ((सूर्यम्) सूर्यसम प्रभावान् उस परमात्मा को (दृशे) देखने के लिए समर्थ होता हूँ। (कवेः) कवि सोम परमात्मा की (अपत्यम्) सन्तान वेदकाव्य को (आ दुहे) दुहता हूँ ॥११॥
Essence
आचार्य द्वारा वेद दुहने की कला को सीखकर जो वेदार्थों को दुहते हैं और वेदप्रतिपाद्य परमेश्वर की आराधना करते हैं, उनका जीवन सफल हो जाता है ॥११॥
Subject
अगले मन्त्र में गुरु के बताये मार्ग द्वारा परमात्मा के साक्षात्कार का वर्णन है।