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Samveda Mantra 1124

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣢प꣣ द्वा꣡रा꣢ मती꣣नां꣢ प्र꣣त्ना꣡ ऋ꣢ण्वन्ति का꣣र꣡वः꣢ । वृ꣢ष्णो꣣ ह꣡र꣢स आ꣣य꣡वः꣢ ॥११२४॥

अ꣡प꣢꣯ । द्वा꣡रा꣢꣯ । म꣣तीना꣢म् । प्र꣣त्नाः꣢ । ऋ꣣ण्वन्ति । कार꣡वः꣢ । वृ꣡ष्णः꣢꣯ । ह꣡र꣢꣯से । आ꣣य꣡वः꣢ ॥११२४॥

Mantra without Swara
अप द्वारा मतीनां प्रत्ना ऋण्वन्ति कारवः । वृष्णो हरस आयवः ॥

अप । द्वारा । मतीनाम् । प्रत्नाः । ऋण्वन्ति । कारवः । वृष्णः । हरसे । आयवः ॥११२४॥

Samveda - Mantra Number : 1124
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
(प्रत्नाः) पुरातन अर्थात् ज्ञान एवं आयु में वृद्ध, (कारवः) मौखिक एवं व्यावहारिक विद्याओं के शिल्पकार, (आयवः) कर्मयोगी गुरुलोग (वृष्णः) सुखवर्षी ज्ञान को (हरसे) शिष्यों के अन्तरात्मा में लाने के लिए (मतीनाम्) शिष्यों की बुद्धियों के (द्वारा) द्वारों को (अप ऋण्वन्ति) खोल देते हैं ॥९॥
Essence
गुरुओं को चाहिए कि वे शिष्यों की बुद्धियों के बन्द द्वारों को खोलकर उन्हें गम्भीर ज्ञान के ग्रहण करने योग्य करके पण्डित बना दें ॥९॥
Subject
आगे फिर वही विषय कहा गया है।