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Samveda Mantra 1115

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवः Chhand- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उप प्रक्षे मधुमति क्षियन्तः पुष्येम रयिं धीमहे त इन्द्र ॥१११५॥

उ꣡प꣢꣯ । प्र꣣क्षे꣢ । प्र꣣ । क्षे꣢ । म꣡धु꣢꣯मति । क्षि꣣य꣡न्तः꣢ । पु꣡ष्ये꣢꣯म । र꣣यि꣢म् । धी꣣म꣡हे꣢ । ते꣣ । इन्द्र ॥१११५॥

Mantra without Swara
उप प्रक्षे मधुमति क्षियन्तः पुष्येम रयिं धीमहे त इन्द्र ॥

उप । प्रक्षे । प्र । क्षे । मधुमति । क्षियन्तः । पुष्येम । रयिम् । धीमहे । ते । इन्द्र ॥१११५॥

Samveda - Mantra Number : 1115
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 7;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) विद्वन् आचार्य वा परमैश्वर्यशाली वीर श्रेष्ठ राजन् ! हम (ते) आपको (धीमहे) आचार्य के पद वा राजा के पद पर प्रतिष्ठित करते हैं। (तव) आपके (मधुमति) मधुर (प्रक्षे) ज्ञान के झरने में वा ऐश्वर्य के झरने में (उप क्षियन्तः) निवास करते हुए, हम (रयिम्) विद्याधन को वा सुवर्ण, वस्त्र, आभूषण आदि धन को (पुष्येम) पुष्ट रूप से प्राप्त करें ॥३॥
Essence
आचार्य के पद पर वा राजा के पद पर यदि सुयोग्य विद्वान् पुरुष प्रतिष्ठापित किया जाए, तो वह सब शिष्यों वा प्रजाजनों को विद्वान् वा धनपति कर सकता है ॥३॥ इस खण्ड में अध्यात्म और अधिराष्ट्र तथा गुरु-शिष्य और राजा-प्रजा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ सप्तम अध्याय में सप्तम खण्ड समाप्त ॥ सप्तम अध्याय समाप्त ॥ चतुर्थ प्रपाठक में प्रथम अर्ध समाप्त ॥
Subject
तृतीय ऋचा पूर्वार्चिक में ४४४ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ गुरु-शिष्य का और राजा-प्रजा का विषय वर्णित है।