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Samveda Mantra 1114

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवः Chhand- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अर्च꣢꣯न्त्यर्कं मरुतः स्वर्का आ स्तोभति श्रुतो युवा स इन्द्रः ॥१११४॥

अ꣡र्च꣢꣯न्ति । अ꣣र्क꣢म् । म꣣रु꣡तः꣢ । स्व꣣र्काः꣢ । सु꣣ । अर्काः꣢ । आ । स्तो꣣भति । श्रुतः꣡ । यु꣡वा꣢꣯ । सः । इ꣡न्द्रः꣢꣯ ॥१११४॥

Mantra without Swara
अर्चन्त्यर्कं मरुतः स्वर्का आ स्तोभति श्रुतो युवा स इन्द्रः ॥

अर्चन्ति । अर्कम् । मरुतः । स्वर्काः । सु । अर्काः । आ । स्तोभति । श्रुतः । युवा । सः । इन्द्रः ॥१११४॥

Samveda - Mantra Number : 1114
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 7;

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1 Bhashyas
Meaning
प्रथम—गुरु और शिष्य के पक्ष में। (स्वर्काः) शुभ वेदमन्त्रों का पाठ करनेवा्ले (मरुतः) प्राणायाम के अभ्यासी शिष्य (अर्कम्) पूजनीय आचार्यदेव का (अर्चन्ति) सत्कार करते हैं। (श्रुतः) प्रसिद्ध, (युवा) युवा के तुल्य सक्रिय (सः इन्द्रः) वह आचार्य, उन्हें (आ स्तोभति) विद्या आदि के प्रदान द्वारा सहारा देता है ॥ द्वितीय—राजा और प्रजा के पक्ष में। (स्वर्काः) सूर्यसम अतितेजस्वी (मरुतः) राष्ट्रवासी मनुष्य (अर्कम्) तेजस्वी राजा का (अर्चन्ति) सत्कार करते हैं। (श्रुतः) सबके द्वारा जिसके गुण सुने गये हैं, ऐसा (युवा) युवक (सः इन्द्रः) वह वीर राजा, उनकी (आ स्तोभति) शरण देकर रक्षा करता है ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥२॥
Essence
शिष्यों से सत्कार किया गया आचार्य और प्रजाजनों से सत्कार किया गया राजा पूर्णरूप से उनका हित करता है ॥२॥
Subject
द्वितीया ऋचा पूर्वार्चिक में ४४५ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ गुरु-शिष्य का और राजा-प्रजा का विषय वर्णित है।