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Samveda Mantra 1110

1875 Mantra
Devata- विश्वे देवाः Rishi- भुवन आप्त्यः साधनो वा भौवनः Chhand- द्विपदा त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ꣣मा꣢꣫ नु कं꣣ भु꣡व꣢ना सीषधे꣣मे꣡न्द्र꣢श्च꣣ वि꣡श्वे꣢ च दे꣣वाः꣢ ॥१११०

इ꣣मा꣢ । नु । क꣣म् । भु꣡व꣢꣯ना । सी꣣षधेम । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । च꣣ । वि꣡श्वे꣢꣯ । च꣣ । देवाः꣢ ॥१११०॥१

Mantra without Swara
इमा नु कं भुवना सीषधेमेन्द्रश्च विश्वे च देवाः ॥१११०

इमा । नु । कम् । भुवना । सीषधेम । इन्द्रः । च । विश्वे । च । देवाः ॥१११०॥१

Samveda - Mantra Number : 1110
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 7;

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Meaning
हम (इन्द्रः च) हमारा जीवात्मा (विश्वे च देवाः) और मन, बुद्धि, प्राण, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय रूप अन्य देव मिलकर (नु कम्) शीघ्र ही (इमा भुवना) इन सब सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, भूमि आदि भुवनों को (सीषधेम) सिद्ध् करें, अर्थात् उनके विषय में ज्ञान प्राप्त कर तथा साधनों का प्रयोग करके उन्हें अपने अनुकूल करें ॥१॥
Essence
विद्वानों को चाहिए कि सब भूगोल और खगोल की विद्याएँ जानकर अन्य लोकों से होनेवाले सब लाभों को प्राप्त करें तथा उनसे सम्भावित हानियों को दूर करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ४५२ क्रमाङ्क पर अध्यात्म विषय में और राष्ट्र के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ भिन्न अर्थ प्रदर्शित किया जाता है।

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