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Samveda Mantra 1104

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ꣣या꣢ प꣣वा꣡ प꣢वस्वै꣣ना꣡ वसू꣢꣯नि माꣳश्च꣣त्व꣡ इ꣢न्दो꣣ स꣡र꣢सि꣣ प्र꣡ ध꣢न्व । ब्र꣣ध्न꣢श्चि꣣द्य꣢स्य꣣ वा꣢तो꣣ न꣢ जू꣣तिं꣡ पु꣢रु꣣मे꣡धा꣢श्चि꣣त्त꣡क꣢वे꣣ न꣡रं꣢ धात् ॥११०४॥

अ꣣या꣢ । प꣡वा꣢ । प꣣वस्व । एना꣢ । व꣡सू꣢꣯नि । मा꣣ꣳश्चत्वे꣢ । इ꣣न्दो । स꣡र꣢꣯सि । प्र । ध꣣न्व । ब्रध्नः꣢ । चि꣣त् । य꣡स्य꣢꣯ । वा꣡तः꣢꣯ । न । जू꣡ति꣢꣯म् । पु꣣रु꣡मे꣢धाः । पु꣣रु । मे꣡धाः꣢꣯ । चि꣣त् । त꣡क꣢꣯वे । न꣡र꣢꣯म् । धा꣣त् ॥११०४॥

Mantra without Swara
अया पवा पवस्वैना वसूनि माꣳश्चत्व इन्दो सरसि प्र धन्व । ब्रध्नश्चिद्यस्य वातो न जूतिं पुरुमेधाश्चित्तकवे नरं धात् ॥

अया । पवा । पवस्व । एना । वसूनि । माꣳश्चत्वे । इन्दो । सरसि । प्र । धन्व । ब्रध्नः । चित् । यस्य । वातः । न । जूतिम् । पुरुमेधाः । पुरु । मेधाः । चित् । तकवे । नरम् । धात् ॥११०४॥

Samveda - Mantra Number : 1104
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 6;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्दो) तेजस्वी, आनन्दरस से सराबोर करनेवाले परमात्मन्, आप (अया) इस (पवा) धारा के साथ (एना) इन (वसूनी) दिव्य और भौतिक धनों को (पवस्व) प्रवाहित करो, (मांश्चत्वे) अभिमानी काम-क्रोध आदि शत्रुओं को नष्ट करनेवाले (सरसि) गतिशील जीवात्मा में (प्र धन्व) पहुँचो, (पुरुमेधाः चित्) बहुत मेधावी मनुष्य भी (तकवे) प्रगति के लिए (यस्य) जिन आपके (नरम्) नेतृत्व के गुण को (धात्) धारण करता है, (ब्रध्नः चित्) महान् (वातः) वायु (न) जैसे (जूतिम्) वेग को (धात्) धारण करता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
वायु आदि सभी प्राकृतिक पदार्थ और सभी मनुष्य परमात्मा के ही पास से अपनी-अपनी शक्ति पाते हैं, उसके सरंक्षण के बिना वे कुछ भी नहीं कर सकते ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५४१ क्रमाङ्क पर परमात्मा के पक्ष में व्याख्यात की जा चुकी है। यहाँ वही विषय प्रकारान्तर से वर्णित किया जा रहा है।