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Samveda Mantra 1099

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पर्वतनारदौ काण्वौ Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
सं꣢ व꣣त्स꣡ इ꣢व मा꣣तृ꣢भि꣣रि꣡न्दु꣢र्हिन्वा꣣नो꣡ अ꣢ज्यते । दे꣣वावी꣡र्मदो꣢꣯ म꣣ति꣢भिः꣣ प꣡रि꣢ष्कृतः ॥१०९९॥

सम् । व꣣त्सः꣢ । इ꣣व । मातृ꣡भिः꣢ । इ꣡न्दुः꣢꣯ । हि꣣न्वानः꣢ । अ꣣ज्यते । देवावीः꣢ । दे꣣व । अवीः꣢ । म꣡दः꣢꣯ । म꣣ति꣡भिः꣢ । प꣡रि꣢꣯ष्कृतः । प꣡रि꣢꣯ । कृ꣣तः ॥१०९९॥

Mantra without Swara
सं वत्स इव मातृभिरिन्दुर्हिन्वानो अज्यते । देवावीर्मदो मतिभिः परिष्कृतः ॥

सम् । वत्सः । इव । मातृभिः । इन्दुः । हिन्वानः । अज्यते । देवावीः । देव । अवीः । मदः । मतिभिः । परिष्कृतः । परि । कृतः ॥१०९९॥

Samveda - Mantra Number : 1099
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 6;

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Meaning
(देवावीः) सदाचारी विद्वानों का रक्षक, (मदः) उत्साह देनेवाला, (इन्दुः) रस से सराबोर करनेवाला, रस का भण्डार परमेश्वर (हिन्वानः) स्तोताओं को शुभ गुण-कर्मों में प्रेरित करता हुआ, (मातृभिः) गौओं द्वारा (परिष्कृतः) जीभ से चाट कर स्वच्छ किये गए (वत्सः इव) बछड़े के समान (मतिभिः) स्तुतियों से (परिष्कृतः) अलङ्कृत होकर (समज्यते) अन्तरात्मा में प्रकट हो जाता है ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
Essence
गौओं द्वारा जीभ से चाटकर बछड़ा जैसे अलङ्कृत किया जाता है, वैसे ही स्तोताओं द्वारा स्तुतियों से परमेश्वर अलङ्कृत किया जाता है। तभी छिपा बैठा हुआ वह उपासक के अन्तरात्मा में प्रकट होता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा का विषय है।

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