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Samveda Mantra 109

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
तं꣡ गू꣢र्धया꣣꣬ स्व꣢꣯र्णरं दे꣣वा꣡सो꣢ दे꣣व꣡म꣢र꣣तिं꣡ द꣢धन्विरे । दे꣣वत्रा꣢ ह꣣व्य꣡मू꣢हिषे ॥१०९॥

त꣢म् । गू꣣र्धय । स्व꣢꣯र्णरम् । स्वः꣢꣯ । न꣣रम् । देवा꣡सः꣢ । दे꣣व꣢म् । अ꣣रति꣢म् । द꣣धन्विरे । देवत्रा꣢ । ह꣣व्य꣢म् । ऊ꣣हिषे ॥१०९॥

Mantra without Swara
तं गूर्धया स्वर्णरं देवासो देवमरतिं दधन्विरे । देवत्रा हव्यमूहिषे ॥

तम् । गूर्धय । स्वर्णरम् । स्वः । नरम् । देवासः । देवम् । अरतिम् । दधन्विरे । देवत्रा । हव्यम् । ऊहिषे ॥१०९॥

Samveda - Mantra Number : 109
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 12;

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्य ! तू (तम्) उस प्रसिद्ध, (स्वर्णरम्) मोक्ष के आनन्द को प्राप्त करानेवाले परमात्मा-रूप अग्नि की (गूर्धय) आराधना कर, जिस (देवम्) तेज से देदीप्यमान तथा तेज से प्रदीप्त करनेवाले, (अरतिम्) सर्वान्तर्यामी, पुरुषार्थ में प्रेरित करनेवाले, पाप आदि के संहारक परमात्मा-रूप अग्नि को (देवासः) विद्वान् लोग (दधन्विरे) अपने अन्तःकरण में धारण करते हैं। अब परमात्माग्नि को सम्बोधन करते हैं—हे परमात्माग्ने ! आप (देवत्रा) विद्वानों में (हव्यम्) दातव्य बल को (ऊहिषे) प्राप्त कराते हो ॥३॥
Essence
मनीषी लोग जिस देवाधिदेव, जगत् की रचना करनेहारे जगदीश्वर की आराधना करके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि के सुख को प्राप्त करते हैं, उसकी सभी जन उपासना क्यों न करें? ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा की अर्चना के लिए प्रेरणा की गयी है।