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Samveda Mantra 1085

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣢ घ꣣ त्वा꣢वान्꣣ त्म꣡ना꣢ यु꣣क्तः꣢ स्तो꣣तृ꣡भ्यो꣢ धृष्णवीया꣣नः꣢ । ऋ꣣णो꣢꣫रक्षं꣣ न꣢ च꣣꣬क्र्योः꣢꣯ ॥१०८५॥

आ । घ꣣ । त्वा꣡वा꣢꣯न् । त्म꣡ना꣢꣯ । यु꣣क्तः꣢ । स्तो꣣तृ꣡भ्यः꣢ । धृ꣣ष्णो । ईयानः꣢ । ऋ꣣णोः꣢ । अ꣡क्ष꣢꣯म् । न । च꣣क्र्योः꣢ ॥१०८५॥

Mantra without Swara
आ घ त्वावान् त्मना युक्तः स्तोतृभ्यो धृष्णवीयानः । ऋणोरक्षं न चक्र्योः ॥

आ । घ । त्वावान् । त्मना । युक्तः । स्तोतृभ्यः । धृष्णो । ईयानः । ऋणोः । अक्षम् । न । चक्र्योः ॥१०८५॥

Samveda - Mantra Number : 1085
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 5;

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Meaning
हे (धृष्णो) शत्रु को धर्षण करने के स्वभाववाले परमात्मन् ! (ईयानः) उपासकों से याचना किये हुए, (त्मना युक्तः) आत्मबल से युक्त (त्वावान्) स्वसदृश स्वयमेव आप (घ) निश्चय ही (स्तोतृभ्यः) उपासक योगियों को योगसिद्धि (ऋणोः) प्राप्त कराते हो, (चक्र्योः) दो रथचक्रों के मध्य में (अक्षं न) जैसे धुरी को रथकार प्राप्त कराता है ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
Essence
जैसे दोनों रथ के पहियों को धुरी की कीली से जोड़ने पर ही पहियों का घूमना और रथ का आगे जाना सम्भव होता है वैसे ही योगी को योगसिद्धि होने पर ही उसका लक्ष्य के प्रति आरोहण और मोक्षलाभ सिद्ध होता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर योग का ही विषय है।