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Samveda Mantra 1082

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अमहीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡मिन्द्रे꣢꣯णो꣣त꣢ वा꣣यु꣡ना꣢ सु꣣त꣡ ए꣢ति प꣣वि꣢त्र꣣ आ꣢ । स꣡ꣳ सूर्य꣢꣯स्य र꣣श्मि꣡भिः꣢ ॥१०८२॥

स꣢म् । इ꣡न्द्रे꣢꣯ण । उ꣣त꣢ । वा꣣यु꣡ना꣢ । सु꣣तः꣢ । ए꣣ति । प꣣वि꣡त्रे꣢ । आ । सम् । सू꣡र्य꣢꣯स्य । र꣣श्मि꣡भिः꣢ ॥१०८२॥

Mantra without Swara
समिन्द्रेणोत वायुना सुत एति पवित्र आ । सꣳ सूर्यस्य रश्मिभिः ॥

सम् । इन्द्रेण । उत । वायुना । सुतः । एति । पवित्रे । आ । सम् । सूर्यस्य । रश्मिभिः ॥१०८२॥

Samveda - Mantra Number : 1082
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 4;

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Meaning
(इन्द्रेण) मन से (उत) और (वायुना) प्राण से (सुतः) अभिषुत ज्ञानरस (पवित्रे) पवित्र जीवात्मा में (सम् आ एति) समागत होता है और (सूर्यस्य रश्मिभिः) सूर्य की किरणों से अथवा चक्षु की वृत्तियों से (सम्) समागत होता है ॥२॥
Essence
मनुष्य का आत्मा जिस ज्ञान को सञ्चित करता है,उसमें मन, प्राण, नेत्र की वृत्तियाँ, अग्नि, वायु, सूर्यकिरणें, गुरुजन सभी कारण बनते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में यह वर्णन है कि आत्मा में ज्ञान कैसे उत्पन्न होता है।

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