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Samveda Mantra 1072

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢द्वी꣣डा꣡वि꣢न्द्र꣣ य꣢त्स्थि꣣रे꣡ यत्पर्शा꣢꣯ने꣣ प꣡रा꣢भृतम् । व꣡सु꣢ स्पा꣢र्हं꣡ तदा भ꣢꣯र ॥१०७२॥

यत् । वी꣣डौ꣢ । इ꣣न्द्र । य꣢त् । स्थि꣣रे꣢ । यत् । प꣡र्शा꣢꣯ने । प꣡रा꣢꣯भृतम् । प꣡रा꣢꣯ । भृ꣣तम् । व꣡सु꣢꣯ । स्पा꣣र्ह꣢म् । तत् । आ । भ꣣र ॥१०७२॥

Mantra without Swara
यद्वीडाविन्द्र यत्स्थिरे यत्पर्शाने पराभृतम् । वसु स्पार्हं तदा भर ॥

यत् । वीडौ । इन्द्र । यत् । स्थिरे । यत् । पर्शाने । पराभृतम् । परा । भृतम् । वसु । स्पार्हम् । तत् । आ । भर ॥१०७२॥

Samveda - Mantra Number : 1072
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) मेरे वीर अन्तरात्मन् ! (यत्) जो धन (वीडौ) दृढ़ मनुष्य में, (यत्) जो धन (स्थिरे) अविचल मनुष्य में, (यत्) जो धन (पर्शाने) बादल के समान सींचनेवाले दानशील मनुष्य में (पराभृतम्) दूर देश से भी ले आया जाता है, (तत्) वह (स्पार्हम्) चाहने योग्य (वसु) आध्यात्मिक तथा भौतिक धन (आ भर) तू अपने पास ला, प्राप्त कर ॥३॥
Essence
संसार में दृढ़ स्वभाववाले, सैकड़ों विघ्नों से भी विचलित न किये जानेवाले परोपकारी जन अपने पराक्रम से जिस ऐश्वर्य को प्राप्त कर लेते हैं, उसे मैं क्यों नहीं पा सकता। हे मेरे अन्तरात्मन् ! तू भी दृढ़, अविचल और बरसानेवाला होकर सब प्रकार का धन सञ्चित कर ॥३॥
Subject
तृतीय ऋचा पूर्वार्चिक में २०७ क्रमाङ्क पर परमात्मा, राजा और आचार्य को सम्बोधित की जा चुकी है। यहाँ अपने अन्तरात्मा को सम्बोधित कर रहे हैं।