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Samveda Mantra 1070

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
भि꣣न्धि꣢꣫ विश्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣢षः꣣ प꣢रि꣣ बा꣡धो꣢ ज꣣ही꣡ मृधः꣢꣯ । व꣡सु꣢ स्पा꣣र्हं꣡ तदा भ꣢꣯र ॥१०७०॥

भि꣣न्धि꣢ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ । प꣡रि꣢꣯ । बा꣡धः꣢꣯ । ज꣣हि꣢ । मृ꣡धः꣢꣯ । व꣡सु꣢꣯ । स्पा꣣र्ह꣢म् । तत् । आ । भ꣣र ॥१०७०॥

Mantra without Swara
भिन्धि विश्वा अप द्विषः परि बाधो जही मृधः । वसु स्पार्हं तदा भर ॥

भिन्धि । विश्वाः । अप । द्विषः । परि । बाधः । जहि । मृधः । वसु । स्पार्हम् । तत् । आ । भर ॥१०७०॥

Samveda - Mantra Number : 1070
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 3;

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Meaning
हे इन्द्र अर्थात् मेरे वीर अन्तरात्मन् ! तू (विश्वाः द्विषः) सब द्वेष करनेवाली शत्रु-सेनाओं को (अपभिन्धि) चीर दे, (बाधः) बाधा डालनेवाले (मृधः) हिंसकों को (परि जहि) चारों ओर नष्ट कर दे। जो (स्पाहर्म्) चाहने योग्य (वसु) दिव्य तथा भौतिक धन है, (तत्) उसका (आ भर) उपार्जन कर ॥१॥ यहाँ एक कर्ता कारक के साथ अनेक क्रियाओं का योग होने से दीपक अलङ्कार है ॥१॥
Essence
मनुष्य का अन्तरात्मा यदि प्रबुद्ध है, तो वह सब कुछ सिद्ध कर सकता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में १३४ क्रमाङ्क पर परमात्मा, राजा और आचार्य को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन दे रहे हैं।

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