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Samveda Mantra 107

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रयोगो भार्गवः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ मꣳहि꣢꣯ष्ठाय गायत ऋ꣣ता꣡व्ने꣢ बृह꣣ते꣢ शु꣣क्र꣡शो꣢चिषे । उ꣣पस्तुता꣡सो꣢ अ꣣ग्न꣡ये꣢ ॥१०७॥

प्र꣢ । मँ꣡हि꣢꣯ष्ठाय । गा꣣यत । ऋता꣡व्ने꣢ । बृ꣣हते꣢ । शु꣣क्र꣡शो꣢चिषे । शु꣣क्र꣢ । शो꣣चिषे । उपस्तुता꣡सः꣢ । उ꣣प । स्तुता꣡सः꣢अ꣣ग्न꣡ये꣢ ॥१०७॥

Mantra without Swara
प्र मꣳहिष्ठाय गायत ऋताव्ने बृहते शुक्रशोचिषे । उपस्तुतासो अग्नये ॥

प्र । मँहिष्ठाय । गायत । ऋताव्ने । बृहते । शुक्रशोचिषे । शुक्र । शोचिषे । उपस्तुतासः । उप । स्तुतासःअग्नये ॥१०७॥

Samveda - Mantra Number : 107
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 12;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (उपस्तुतासः) प्रशंसा-प्राप्त मनुष्यो ! तुम (मंहिष्ठाय) सबसे बढ़कर दानी, (ऋताव्ने) सत्य नियमोंवाले, (बृहते) महान्, (शुक्रशोचिषे) उज्ज्वल और पवित्र तेजवाले (अग्नये) परमेश्वर के लिए (प्र गायत) भली-भाँति स्तुति-गीत गाओ ॥१॥
Essence
प्रशंसित जनों को चाहिए कि वे परमेश्वर की उपासना कर, उसके समान दान, सत्य, तेजस्विता, पवित्रता आदि गुणों को धारण कर यशस्वी हों ॥१॥
Subject
अगले मन्त्र में मनुष्यों को परमेश्वर का गुणगान करने की प्रेरणा दी गयी है।