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Samveda Mantra 1068

1875 Mantra
Devata- आदित्याः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
रा꣣या꣡ हि꣢रण्य꣣या꣢ म꣣ति꣢रि꣣य꣡म꣢वृ꣣का꣢य꣣ श꣡व꣢से । इ꣣यं꣡ विप्रा꣢꣯ मे꣣ध꣡सा꣢तये ॥१०६८॥

रा꣡या꣢ । हि꣣रण्यया꣢ । म꣣तिः꣢ । इ꣣य꣢म् । अ꣣वृका꣡य꣢ । अ꣣ । वृका꣡य꣢ । श꣡व꣢꣯से । इ꣣य꣢म् । वि꣡प्रा꣢꣯ । वि । प्रा꣣ । मेध꣡सा꣢तये । मे꣣ध꣢ । सा꣣तये ॥१०६८॥

Mantra without Swara
राया हिरण्यया मतिरियमवृकाय शवसे । इयं विप्रा मेधसातये ॥

राया । हिरण्यया । मतिः । इयम् । अवृकाय । अ । वृकाय । शवसे । इयम् । विप्रा । वि । प्रा । मेधसातये । मेध । सातये ॥१०६८॥

Samveda - Mantra Number : 1068
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 3;

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Meaning
हे सर्वमित्र जगदीश्वर ! (इयं मतिः) यह हमारी बुद्धि वा स्तुति (हिरण्यया राया) सुवर्णरूप धन के साथ (अवृकाय) अखण्डित (शवसे) आत्मबल के लिए होवे और (विप्रा इयम्) विशेष रूप से पूर्ण करनेवाली यह बुद्धि वा स्तुति (मेधसातये) आपके साथ सङ्गम की प्राप्ति के लिए हो ॥२॥
Essence
अपने बुद्धि के बल से और परमेश्वर की स्तुति से हम चाँदी, सोना, मणि, मोती आदि धन को, पराजित न होनेवाले बल को और परमात्मा के साथ मिलाप को प्राप्त कर लें ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में मित्र जगदीश्वर से प्रार्थना की गयी है।

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