Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 1062

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ गव्या꣢꣯नि वी꣣त꣡ये꣢ नृ꣣म्णा꣡ पु꣢ना꣣नो꣡ अ꣢र्षसि । स꣣न꣡द्वा꣢जः꣣ प꣡रि꣢ स्रव ॥१०६२॥

अ꣣भि꣢ । ग꣡व्या꣢꣯नि । वी꣣त꣡ये꣢ । नृ꣣म्णा꣢ । पु꣣नानः꣢ । अ꣣र्षसि । सन꣡द्वा꣢जः । स꣣न꣢त् । वा꣣जः । प꣡रि꣢꣯ । स्र꣣व ॥१०६२॥

Mantra without Swara
अभि गव्यानि वीतये नृम्णा पुनानो अर्षसि । सनद्वाजः परि स्रव ॥

अभि । गव्यानि । वीतये । नृम्णा । पुनानः । अर्षसि । सनद्वाजः । सनत् । वाजः । परि । स्रव ॥१०६२॥

Samveda - Mantra Number : 1062
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे सोम अर्थात् विद्यारस के भण्डार आचार्य ! (वीतये) हम शिष्यों की प्रगति के लिए (गव्यानि) इन्द्रियों के (नृम्णा) बलों को (पुनानः) पवित्र करते हुए, आप (अभि अर्षसि) हमारे प्रति आते हो। वे आप (सनद्वाजः) अन्न, धन आदि देते हुए (परि स्रव) बहो, अर्थात् हमें विद्या पढ़ाओ ॥२॥
Essence
कुलपति आचार्य छात्रों के चरित्रों को पवित्र करते हुए, उन्हें अन्न-वस्त्र-बल आदि प्रदान करते हुए अगाध विद्या पढ़ाएँ ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में छात्र आचार्य को कह रहे हैं।